
यूपी में राज्यसभा की 10 सीटों पर चुनाव की आहट, बीजेपी-सपा के बीच नए सियासी समीकरण पर नजर
लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश की राजनीति में नवंबर का महीना महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। राज्यसभा की 10 सीटों पर सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने के बाद होने वाले चुनाव को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के लिए अहम परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है। विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के आधार पर इन सीटों के लिए दलों का गणित पिछली स्थिति की तुलना में बदला हुआ है।
वर्तमान विधानसभा के आंकड़ों के आधार पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आठ राज्यसभा सीटों पर अपने उम्मीदवारों को जिताने की स्थिति में बताई जा रही है, जबकि समाजवादी पार्टी (सपा) दो सीटों पर जीत की स्थिति में नजर आ रही है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पास पर्याप्त विधायक नहीं होने के कारण उसके लिए राज्यसभा में प्रतिनिधित्व बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सपा के सामने पीडीए और सामाजिक संतुलन की चुनौती
दो सीटों की संभावित जीत सपा के लिए उम्मीदवार चयन के लिहाज से महत्वपूर्ण होगी। पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव को एक सीट से फिर मौका मिलने की चर्चा है। दूसरी सीट के लिए पार्टी सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए गैर-यादव पिछड़े या दलित चेहरे पर दांव लगा सकती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए जाट या गुर्जर समुदाय से उम्मीदवार बनाए जाने की संभावनाओं पर भी चर्चा है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व के स्तर पर होना है। उम्मीदवार चयन के जरिए सपा अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ को और मजबूत करने की कोशिश कर सकती है।
भाजपा के सामने आठ सीटों का संभावित गणित
विधानसभा में संख्या बल के आधार पर भाजपा आठ सीटें जीतने की स्थिति में बताई जा रही है। ऐसे में पार्टी के सामने उम्मीदवारों के चयन और क्षेत्रीय-सामाजिक संतुलन साधने की चुनौती होगी।
राजनीतिक हलकों में पूर्व उपमुख्यमंत्री की रिक्त सीट पर वरिष्ठ ब्राह्मण चेहरे को अवसर दिए जाने की चर्चा है। इसके अलावा लोकसभा चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाने वाले कुछ क्षेत्रीय नेताओं को भी राज्यसभा के जरिए नई जिम्मेदारी दिए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि इन नामों पर अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व ही करेगा।
बसपा के लिए प्रतिनिधित्व बचाने की चुनौती
विधानसभा में कम संख्या बल के कारण बसपा के लिए राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार उतारना आसान नहीं होगा। चुनावी गणित के मुताबिक पार्टी के लिए आवश्यक संख्या जुटाना और पर्याप्त प्रस्तावक उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती बन सकता है।
यदि बसपा राज्यसभा चुनाव में प्रभावी तरीके से अपनी दावेदारी पेश नहीं कर पाती है, तो यह उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा संख्या के लिहाज से उसके सामने खड़ी राजनीतिक चुनौतियों को भी सामने लाएगा।
2027 से पहले अहम होगा राज्यसभा चुनाव
राज्यसभा की 10 सीटों का चुनाव भले ही संसद के उच्च सदन में दलों की संख्या से जुड़ा हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में इसका राजनीतिक महत्व इससे कहीं व्यापक माना जा रहा है। नवंबर में होने वाली चुनावी प्रक्रिया में उम्मीदवारों का चयन, सामाजिक समीकरण और विधायकों का समर्थन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलों की रणनीतिक प्राथमिकताओं की झलक दे सकता है।
भाजपा जहां अपने सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की कोशिश करेगी, वहीं सपा के सामने पीडीए गठजोड़ को राजनीतिक रूप से और मजबूत करने की चुनौती होगी। इस पूरी प्रक्रिया में उम्मीदवारों के नाम और मतदान के दौरान बदलते समीकरण सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले पहलू हो सकते हैं।
