Tuesday, May 19, 2026
HomeNewsbeatकटते जंगल रो रहे, काँपे सब जज़्बात।मानव अपने हाथ से, लिखता खुद...

कटते जंगल रो रहे, काँपे सब जज़्बात।मानव अपने हाथ से, लिखता खुद की मात॥

धरती माँ की छाँव थे, हरियाले वनराज,
इनके दम से जीवित है, जीव-जगत समाज।
लोभ बढ़ा तो काटकर, भूल गया औकात—
कटते जंगल रो रहे, काँपे सब जज़्बात॥

पेड़ों की हर डाल पर, चिड़ियों का परिवार,
इनसे ही वर्षा बहे, महके घर-संसार।
कुल्हाड़ी के वार से, काँपे सब जज़्बात—
मानव अपने हाथ से, लिखता खुद की मात॥

छाया देकर वृक्ष ने, सहा धूप का वार,
फल-फूलों से भर दिया, जीवन का भंडार।
बदले में इंसान ने, दिए क्रूर आघात—
कटते जंगल रो रहे, सूखे नभ के गात॥

नदियाँ, पर्वत, खेत सब, वृक्षों से आबाद,
इनके बिन सूना लगे, धरती हो बर्बाद।
जिस थाली में खा रहा, उसको मारे लात—
मानव अपने हाथ से, लिखता खुद की मात॥

प्राणवायु देकर सदा, वृक्ष रहे निष्काम,
फिर भी मानव कर रहा, उनका काम तमाम।
जागो अब हे मनुज तुम, बदलो अब हालात—
कटते जंगल रो रहे, काँपे सब जज़्बात॥

डॉ. प्रियंका सौरभ

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments