खरमास समाप्ति के बाद बजेगी शहनाई: 15 अप्रैल से शुरू होगा मांगलिक कार्यों का शुभ दौर, जून तक लग्न की धूम
लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा धार्मिक डेस्क)। भारतीय सनातन परंपरा में खरमास का विशेष महत्व है, और इसके समाप्त होते ही विवाह जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है। इस वर्ष 14 अप्रैल को खरमास समाप्त हो रहा है, जिसके अगले ही दिन 15 अप्रैल से शहनाइयों की गूंज सुनाई देने लगेगी। शहर से लेकर गांव तक शादी-ब्याह का माहौल बन जाएगा और बैंड-बाजे, ढोल-ताशों की धुन पर लोग जश्न में डूबेंगे।
ज्योतिषाचार्य पंडित सुधीर मिश्र के अनुसार, 15 मार्च को सूर्य देव के मीन राशि में प्रवेश के साथ ही खरमास की शुरुआत हुई थी। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार जब सूर्य धनु या मीन राशि में रहते हैं, तब खरमास लगता है। 14 अप्रैल को इसके समाप्त होते ही सभी मांगलिक कार्यों पर लगी रोक हट जाएगी और शुभ कार्यों का सिलसिला फिर से शुरू हो जाएगा।
पंडित सत्य प्रकाश पाण्डेय बताते हैं कि यह शुभ अवधि ज्यादा लंबी नहीं रहेगी। 6 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास का आरंभ हो जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन से भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं और चार महीने तक विवाह सहित अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इसके बाद देवोत्थान एकादशी पर भगवान के जागने के साथ ही पुनः शुभ कार्य प्रारंभ होते हैं।
इस बार अप्रैल से जून के अंतिम सप्ताह तक लग्न का विशेष संयोग बन रहा है, जिससे विवाह समारोहों की भरमार देखने को मिलेगी। सड़कों, गलियों और विवाह स्थलों पर रौनक बढ़ेगी, बधाइयों और उत्सव का माहौल चरम पर होगा।
हालांकि, इस बार शादियों का खर्च मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है। बदलते ट्रेंड और नई रस्मों ने विवाह को पहले की तुलना में अधिक महंगा बना दिया है। बैंड-बाजा, ढोल-ताशा, कैटरिंग, लाइटिंग, सजावट और गाड़ियों के किराए में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके अलावा पगड़ी समारोह, रैंप वॉक जैसे नए चलन भी बजट पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं।
एलपीजी सिलिंडर की कमी और कॉमर्शियल गैस की उपलब्धता में आ रही बाधाओं ने भी शादी के खर्च को बढ़ाया है। ऐसे में बेटी का विवाह करना अब मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं रह गया है। कई परिवार खर्च को संतुलित करने के लिए सीमित कार्यक्रम और सादगीपूर्ण विवाह का विकल्प भी अपना रहे हैं।
धार्मिक दृष्टि से देखें तो अप्रैल, मई और जून में कई शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं, जिनमें विवाह संपन्न किए जा सकते हैं।
अप्रैल में 15, 20, 21, 25, 27, 28 और 29 तारीखें शुभ मानी गई हैं।
मई में 1, 3, 5, 6, 7, 8, 13 और 14 को उत्तम लग्न हैं।
जून में 21, 22, 23, 24, 25, 26, 27 और 29 तारीखों को विवाह के लिए श्रेष्ठ योग बन रहे हैं।
धर्माचार्यों का कहना है कि इन शुभ तिथियों में विवाह करने से दांपत्य जीवन में सुख, समृद्धि और स्थिरता आती है। ऐसे में लोग अपनी सुविधा और परंपराओं के अनुसार इन मुहूर्तों का चयन कर सकते हैं।
खरमास समाप्ति के साथ ही जहां एक ओर मांगलिक कार्यों की बहार आएगी, वहीं दूसरी ओर बढ़ती महंगाई और बदलते ट्रेंड के बीच विवाह आयोजन एक बड़ी आर्थिक चुनौती भी बनकर सामने आ रहा है। इसके बावजूद भारतीय समाज में विवाह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
