आरोपी शालिनी श्रीवास्तव के दफ्तर में DM की मौजूदगी से हलचल; 16 लाख की घूस और शिक्षक की मौत के बाद अब ‘आर-पार’ के मूड में प्रशासन! , आरोपी बाबू की नियुक्ति भी सवाल के घेरे में

गौरव कुशवाहा
देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)शिक्षक कृष्ण मोहन सिंह आत्महत्या कांड ने अब सीधे जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारियों को सड़क पर उतार दिया है। सीडीओ और एसडीएम के बाद अब जिलाधिकारी दिव्या मित्तल खुद बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय पहुंच चुकी हैं। जिस दफ्तर में बैठकर कल तक ‘रंगदारी’ और ‘वसूली’ का खेल चल रहा था, आज वहां भारी पुलिस बल और आला अधिकारियों का जमावड़ा है।
DM की मौजूदगी: कार्रवाई का संकेत या बचाव का रास्ता?
सूत्रों के मुताबिक, DM दिव्या मित्तल सीधे उस ‘क्राइम सीन’ (BSA दफ्तर) का मुआयना कर रही हैं, जहां कृष्ण मोहन को मौत से पहले आखिरी बार जलील किया गया था। सवाल यह है कि क्या DM साहिबा वहां BSA शालिनी श्रीवास्तव को तत्काल प्रभाव से हटाने का आदेश जारी करेंगी, या फिर यह पूरी कवायद केवल उन ‘डिजिटल सबूतों’ और ‘फाइलों’ को सुरक्षित करने की है जो शासन तक पहुंचने वाली हैं?
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आरोपी BSA के चेहरे पर शिकन, पर कुर्सी का मोह बरकरार!
हैरानी की बात यह है कि BNS की धारा 108 और 351(3) में FIR दर्ज होने के बावजूद, आरोपी BSA अभी भी दफ्तर में मौजूद हैं। कानून की नजर में एक अपराधी और जांच अधिकारी का एक ही छत के नीचे होना ‘फेयर इन्वेस्टिगेशन’ के सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाना है। क्या DM की मौजूदगी में शालिनी श्रीवास्तव का ‘कन्फेशन’ (जुर्म कुबूल करना) दर्ज होगा, या फिर बाबू संजीव सिंह को बलि का बकरा बनाकर मामले को दफन कर दिया जाएगा?
जनता की नजरें: क्या ‘जीरो टॉलरेंस’ सिर्फ कागजों पर है?
देवरिया की जनता और शिक्षक समाज की नजरें इस वक्त BSA दफ्तर पर टिकी हैं। 16 लाख की घूसखोरी का आरोपी अगर DM के बगल में बैठा है, तो यह सिस्टम की शुचिता पर सबसे बड़ा सवाल है। क्या DM दिव्या मित्तल अपनी उस ‘कठोर छवि’ के अनुरूप कार्रवाई करेंगी जिसके लिए वे जानी जाती हैं, या फिर ‘आईएएस-पीसीएस लॉबी’ एक बार फिर अपने साथी को बचाने के लिए ढाल बन जाएगी?
