आदित्य–शिव स्तुति: महादेव की दिव्य आराधना में ओतप्रोत काव्य
लेखक: डॉ. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
🔱 भूमिका
आदित्य–शिव स्तुति भगवान शिव के सगुण-निर्गुण स्वरूप, उनके महाकाल रूप, औंकार तत्व और कैलासवासी भोलेनाथ की महिमा का काव्यात्मक वर्णन है। यह रचना शिव-भक्ति, वेदांत और शैव दर्शन को समाहित करती हुई पाठक को आध्यात्मिक शांति और चेतना के उच्च स्तर तक ले जाती है।
🕉️ आदित्य–शिव स्तुति
शिव ॐकार, शिव चंद्रभाल,
शिव महादेव, शिव व्याघ्रछाल।
शिव महाकाल, शिव नीलकंठ,
शिव त्रिशूलधर, शिव भोकराल।
स्वरूप सुंदर सत्य शिव ॐ का,
जटा जूट घटा सुव्योम की।
किरीट शीश सोम चंद्रभाल का,
बहती रहे सुधारधार श्रीगंग की।
त्रिनेत्र नेत्र तीसरा ललाटभाल,
प्रदीप्त अग्नि दग्ध शिखा।
गले भुजंगमाल शेषनाग की,
फुफकार मार गले झुलते दिखा।
अक्षमाल, नरमुण्डमाल संग,
त्रिशूल-डमरु शोभित हाथ में।
गौरी गणेश कार्तिकेय संग,
शंभु विराजें विश्वनाथ में।
सुरेश महेश भवेश भस्म अंग,
तांडव लपेटे व्याघ्र चर्म।
काल भी डोले, कामदेव थर,
अकाल काल शंभु परम।
सोमनाथ, ॐकारनाथ, अमरनाथ,
केदारनाथ, तुंगनाथ।
महाकाल भोले भुआल आप,
नाममि ईश, हे भोलेनाथ।
चिदानंद, सच्चिदानंद रूप,
तुषाराद्रि गौर काया।
गंगाधर, सुर-नर-मुनि वंदित,
महेश हृदय सुखदाया।
गवेंद्राधिरूढ़ शिव भूषणांग,
दिव्यांबर, मन्दारमाल।
नमस्ते ओंकारनाथ प्रभु,
भुजविशाल, करुणाल।
प्रातः स्मरामि भवभयहर,
विश्वविजित, सर्वलोकेश।
संसार रोगहर महाऔषध,
अद्वितीय, महेश।
निराकार ॐकार निशीथनाथ,
कैलाशपति, गिरीश।
आदि-अंत, आदित्यनाथ आप,
कलातीत, कल्याण ईश।
