Monday, February 2, 2026
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“भगवान विष्णु की दिव्य लीला: अधर्म का अंत और करुणा का उदय

⭐ शास्त्रोक्त कथा • भगवान विष्णु अवतार महागाथा

(धर्म की विजय और करुणा के दीप से आलोकित एक दिव्य प्रकरण)
हमने जाना कि कैसे अधर्म की जड़ें फैलने लगीं और कैसे भगवान विष्णु ने धर्म-संरक्षण हेतु अपना दिव्य अवतार धारण किया। जहाँ इस अवतार की लीला एक नए मोड़ पर पहुँचती है। यह वह समय था जब संसार अन्याय, अत्याचार और अज्ञान के अंधकार में डूबता जा रहा था, परंतु धर्म का दीप अभी भी पूरी शक्ति से जल रहा था—क्योंकि उसे स्वयं श्रीहरि का आशीर्वाद प्राप्त था।
अध्याय आरंभ—अधर्म की छाया और भक्तों का पुकारना

समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। पर जैसे-जैसे असुरों का साम्राज्य फैलने लगा, वैसे-वैसे सत्वगुण की लौ मद्धम होने लगी। यही वह क्षण था जब पृथ्वी—भूदेवी—ने पुनः भगवान विष्णु का स्मरण किया।

भक्तों की वेदनाएँ आकाश तक जा पहुँचीं।
निष्पापों के आँसू, पीड़ितों की व्यथा, और धर्मात्माओं की आहें—सब मिलकर एक दिव्य पुकार बन गई थीं।

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इसी पुकार ने वैकुण्ठ लोक के शांत वातावरण को भी आंदोलित कर दिया। शंख बज उठा, चक्र चमका, और भगवान बोले—

“जब-जब धर्म की क्षीणता होती है, मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।”

यह मात्र घोषणा नहीं थी बल्कि युगों-युगों से चली आ रही दिव्य प्रतिज्ञा का पुनः स्मरण था।

दिव्य अवतार की नई लीला—शस्त्र नहीं, शांति का प्रकाश

इस अवतार की विशेषता असाधारण थी।
यह अवतार केवल युद्ध का प्रतीक नहीं था—यह करुणा, धर्म, क्षमा, न्याय और समत्व का मूर्त रूप था।
जहाँ शस्त्र आवश्यक था, वहाँ शस्त्र का प्रयोग हुआ;पर जहाँ मन परिवर्तन संभव था, वहाँ भगवान ने अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र जगाया।
“धर्म का प्रकाश।”
यह प्रकाश किसी आग, किसी वज्र, किसी शस्त्र जैसा नहीं था।
यह वह तेज था जो अज्ञान को जलाता था, क्रोध को पिघलाता था, और पाप को विवेक में बदल देता था।

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अहंकार का महासागर और विष्णु की करुणा
असुरों का स्वामी, जिसने अपने भीतर अहंकार का अथाह समुद्र बना लिया था, अब स्वयं को अजेय समझने लगा था।
उसके किले सोने के थे, सेना असंख्य थी, पर हृदय अंधकार से भरा था।
भगवान विष्णु उसके सामने प्रकट हुए।
परंतु उनका रूप युद्ध के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान के उद्घाटन के लिए था।

असुर चकित था—
“मैं हथियारों से लड़ा हूँ, पर यह दिव्य तेज क्या है? यह शांति, यह स्थिरता, यह करुणा—ये किस प्रकार की शक्ति है?”
विष्णु मुस्कुराए—
“सबसे बड़ी विजय शत्रु को पराजित करने में नहीं, उसे सत्य का मार्ग दिखाने में है।”
उनकी वाणी ने असुर के हृदय में हलचल पैदा की। कुछ पलों के लिए वह शक्ति-विभ्रम भूल गया और अपनी वास्तविक स्थिति को देख सका।
धर्म का क्षण—जहाँ शत्रु भी शिष्य बन सकता है
विष्णु ने कहा—
“अधर्म का विनाश केवल युद्ध से नहीं होता—अभिमान का त्याग ही अधर्म के अंत का प्रारंभ है।”
ये दिव्य शब्द असुर के कानों में नहीं, उसके अंतर में गूंजे।
पहली बार उसे अपनी सीमाओं का अनुभव हुआ।

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वह बोला—
“प्रभु, यदि मैं भूल गया, तो क्या मेरी क्षमा संभव है?”
भगवान का उत्तर वही था जिससे युग-युगांत तक भक्तों का मन संबल पाता है—
“जिस क्षण तुम सत्य की ओर मुड़ते हो, उसी क्षण ईश्वर तुम्हें स्वीकार कर लेते हैं।”
इस एक वचन से उसके भीतर का अंधकार टूट गया।
जो असुर कभी भय का प्रतीक था, वह क्षणभर में पश्चाताप का, और फिर परिवर्तन का प्रतीक बन गया।
लोककल्याण की दिशा—विष्णु का धर्मपथ
असुरों के पश्चाताप और परिवर्तन के बाद भगवान विष्णु ने पूरे लोक में आस्था का दीप पुनः प्रज्वलित किया।

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उन्होंने धर्म के पाँच स्तंभों की स्थापना की—

  1. सत्य – विचार, व्यवहार और निर्णय में स्पष्टता।
  2. धर्म – कर्तव्य पालन, न्याय और सह-अस्तित्व।
  3. करुणा – अहंकार की जगह करुणाभाव।
  4. क्षमा – परिवर्तन का द्वार।
  5. समता – सभी जीवों में एक ही ब्रह्म तत्व का दर्शन।
    इन पाँचों स्तंभों पर आधारित समाज ही स्थायी, शांतिपूर्ण और समृद्ध होता है।
    भक्तों के लिए संदेश—आस्था ही साकार रूप देती है
    भगवान विष्णु ने जाते-जाते यही कहा—
    “जहाँ आस्था होती है, वहाँ मार्ग स्वयं बनते हैं; जहाँ सत्य होता है, वहां विजय सुनिश्चित होती है।”
    इस अवतार की कथा यह सिद्ध करती है कि—
    ईश्वर हमारे बीच हैं।

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जब हम सत्य के साथ खड़े होते हैं, तब समस्त ब्रह्मांड हमारे लिए मार्ग प्रशस्त कर देता है।
धर्म कभी पराजित नहीं होता, चाहे अंधकार कितना भी विशाल क्यों न हो।
एपिसोड–6 इस दिव्य बोध के साथ समाप्त होता है, परंतु आगे की लीलाएँ और भी अद्भुत हैं।
अगले एपिसोड में जानेंगे—
धर्म की स्थापना के बाद लोककल्याण की दिव्य योजनाएँ।

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