✍️ प्रेम का रंग – त्याग, सहिष्णुता और ईमानदारी की प्रेरक कविता

प्रेम का रंग चढ़ता चला गया,
यूँ लगा कि दुनिया हमारी है,
त्याग का यत्न जब सीखा तो
ऐसा लगा कि जन्नत हमारी है।
जीवन का साथ निभाता चला गया,
समस्याएँ भी सुलझाता चला गया,
दहशतगर्दी का शोक मनाया नहीं,
बर्बादियों का दर्द भुलाता चला गया।
जो कुछ मयस्सर हुआ उसको
अपनी तक़दीर समझ लिया,
जो मिला नहीं कभी भी उसको
मैं अनदेखा करता चला गया।
दुख और सुख में फ़र्क़ कोई
न कभी हमने महसूस किया,
दिल के हर ज़ख़्म को जीवन भर
मैं तो सहलाता चला गया।
जैसे स्नान से तन, दान से धन,
सहिष्णुता से मन निर्मल होते हैं,
वैसे ही ईमानदारी से यह जीवन
आदित्य सफल हो जाया करते हैं।
— विद्यावाचस्पति डॉ० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’

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📌 कविता का सार
यह प्रेम का रंग केवल भावनाओं का नहीं, बल्कि त्याग और ईमानदारी का प्रतीक है। कविता जीवन की सफलता का संदेश देती है कि प्रेम, सहिष्णुता और सत्यनिष्ठा से ही जीवन सार्थक बनता है।
इस प्रेरणादायक कविता में लेखक ने संघर्षों के बीच धैर्य, विश्वास और सकारात्मक सोच को जीवन की असली शक्ति बताया है।

Editor CP pandey

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