रसोई में महंगाई का तड़का: प्याज 70 रुपये पार, चीनी की तेजी ने बढ़ाई चिंता; किसान और उपभोक्ता के बीच संतुलन की अग्निपरीक्षा
गोंदिया, महाराष्ट्र। त्योहारी मौसम की दस्तक के साथ भारतीय रसोई में एक बार फिर प्याज के आंसू दिखाई देने लगे हैं। जिस प्याज की खुदरा कीमत कुछ समय पहले करीब 25 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास थी, वही कई बाजारों में 60 से 70 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। दूसरी ओर चीनी की कीमतों में तेजी ने घरेलू बजट पर दोहरा दबाव बढ़ा दिया है।
भारत जैसे देश में प्याज और चीनी की कीमतों में तेजी को महज बाजार की सामान्य उठापटक मानना पर्याप्त नहीं है। दोनों आवश्यक खाद्य वस्तुएं हैं और इनकी कीमतें सीधे उपभोक्ता की रसोई, किसान की आय, सरकारी नीतियों और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करती हैं। मौजूदा स्थिति के पीछे उत्पादन, मौसम, भंडारण, आपूर्ति-श्रृंखला, बाजार व्यवहार, सरकारी हस्तक्षेप और वैश्विक खाद्य बाजार से जुड़े कई पहलू एक साथ काम कर रहे हैं।
मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र, मानता हूं कि प्याज की मौजूदा तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण आपूर्ति और मांग के बीच पैदा हुआ असंतुलन है। खरीफ प्याज की नई फसल अपेक्षित समय पर बाजार में नहीं पहुंच पाने तथा पुरानी फसल के भंडारण पर मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों और नमी के असर से उपलब्ध स्टॉक पर दबाव बढ़ा है।
बेमौसम बारिश का असर केवल खेत में खड़ी फसल तक सीमित नहीं रहता। कटाई के बाद रखे गए प्याज की गुणवत्ता और भंडारण क्षमता भी प्रभावित होती है। इससे बाजार में उपलब्ध अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज की मात्रा घट सकती है। वहीं त्योहारी मौसम में मांग बढ़ने पर आपूर्ति की यह कमी कीमतों को तेजी से ऊपर ले जाती है। यही वजह है कि कुल उत्पादन के आंकड़े सामान्य दिखाई देने के बावजूद बाजार में बिक्री योग्य प्याज की वास्तविक उपलब्धता कम होने पर खुदरा कीमतों में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।
इसी परिस्थिति में केंद्र सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए अपने रणनीतिक प्याज बफर स्टॉक को बाजार में उतारने का फैसला किया है। करीब 1.21 लाख टन बफर स्टॉक के जरिए प्याज की उपलब्धता बढ़ाने और प्रमुख उपभोग केंद्रों तक तेजी से आपूर्ति पहुंचाने की रणनीति अपनाई गई है। सरकार का उद्देश्य केवल दिल्ली जैसे बड़े बाजारों में प्याज उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि अतिरिक्त आपूर्ति के जरिए थोक बाजार में भी कीमतों पर दबाव बनाना है।
बफर स्टॉक बाजार में सरकार की मौजूदगी का संकेत भी देता है। यदि बाजार में यह विश्वास बना रहे कि सरकार के पास पर्याप्त स्टॉक है और आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त प्याज जारी किया जा सकता है, तो जमाखोरी और कृत्रिम कमी की संभावना को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। इस लिहाज से बफर स्टॉक केवल प्याज का भंडार नहीं, बल्कि मूल्य स्थिरीकरण का एक महत्वपूर्ण आर्थिक उपकरण है।
सरकारी रणनीति का एक चर्चित हिस्सा नासिक से शुरू की गई विशेष कांदा (प्याज) एक्सप्रेस है। महाराष्ट्र का नासिक क्षेत्र देश के प्रमुख प्याज उत्पादक केंद्रों में शामिल है। वहां से दिल्ली-एनसीआर और अन्य बड़े उपभोग केंद्रों तक रेल के जरिए प्याज पहुंचाने का उद्देश्य परिवहन समय और लागत को कम करना है।
रिपोर्टों के अनुसार करीब 840 मीट्रिक टन की निर्धारित क्षमता के मुकाबले लगभग 450 मीट्रिक टन प्याज ही भेजा जा सका और प्रस्तावित पांच में से चार कांदा एक्सप्रेस ट्रेनें रद्द हो गईं। इस स्थिति को केवल प्रशासनिक विफलता के रूप में देखना उचित नहीं होगा। उपलब्ध प्याज की मात्रा, लोडिंग की तैयारी, मंडियों से समय पर माल की उपलब्धता, रेलवे रेक, मार्ग और अन्य परिचालन संबंधी समस्याएं इसके पीछे कारण हो सकती हैं। किसानों और व्यापारियों के विरोध का पहलू भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण है।
यदि स्थानीय बाजार में किसानों और व्यापारियों को यह आशंका हो कि बड़ी मात्रा में प्याज बाहर भेजे जाने से स्थानीय कीमतों पर असर पड़ेगा, तो लोडिंग के लिए पर्याप्त मात्रा जुटाना चुनौती बन सकता है। इसलिए 840 मीट्रिक टन की क्षमता के मुकाबले करीब 450 मीट्रिक टन प्याज की वास्तविक आपूर्ति केवल परिवहन व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि कृषि बाजार की जटिल वास्तविकताओं का भी संकेत है।
सरकार ने रेलवे परिवहन के साथ-साथ राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ (NCCF), राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन महासंघ (NAFED) और केंद्रीय भंडार जैसे सरकारी एवं सहकारी वितरण तंत्र के माध्यम से उपभोक्ताओं को रियायती दर पर प्याज उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की है। दिल्ली-एनसीआर सहित प्रमुख शहरों में मोबाइल वैन और निर्धारित बिक्री केंद्रों के माध्यम से करीब 35 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर प्याज उपलब्ध कराने का प्रयास इसी नीति का हिस्सा है।
इसका उद्देश्य बाजार की ऊंची खुदरा कीमत और सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे प्याज की कीमत के बीच अंतर पैदा कर आम उपभोक्ता को तत्काल राहत देना है। यदि पर्याप्त मात्रा में और नियमित रूप से सस्ता प्याज उपलब्ध कराया जाता है तो इसका असर सरकारी बिक्री केंद्रों तक सीमित नहीं रह सकता। निजी बाजार पर भी कीमतें नियंत्रित करने का दबाव बन सकता है।
हालांकि सरकारी हस्तक्षेप का दूसरा और बेहद महत्वपूर्ण पक्ष किसान से जुड़ा है। उपभोक्ता चाहता है कि प्याज 30-35 रुपये किलो मिले, जबकि किसान चाहता है कि उसकी उपज का मूल्य उसकी लागत, मेहनत और जोखिम के अनुरूप मिले। यही कृषि अर्थव्यवस्था का सबसे कठिन संतुलन है।
किसान बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, श्रम और परिवहन पर खर्च करता है। इसके बाद उसे मौसम की मार और भंडारण संबंधी जोखिम भी झेलने पड़ते हैं। जब बाजार में कीमत बढ़ती है तो किसान को लगता है कि उसे अपनी लागत और जोखिम की भरपाई का अवसर मिल रहा है। लेकिन उसी समय सरकार बफर स्टॉक बाजार में उतारकर कीमतों को नियंत्रित करती है तो किसान संगठनों में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।
इसलिए उपभोक्ता राहत और किसान आय, दोनों को साथ लेकर चलने वाली नीति के बिना प्याज की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। यही विरोधाभास कांदा एक्सप्रेस के मामले में भी दिखाई देता है। सरकार के लिए नासिक से दिल्ली जैसे बड़े उपभोग केंद्रों तक प्याज पहुंचाना महंगाई नियंत्रण का उपाय है, जबकि कुछ किसानों के लिए यही हस्तक्षेप खुले बाजार में बेहतर कीमत मिलने की संभावना को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए किसान संगठनों के विरोध को केवल सरकार विरोधी राजनीति के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। इसके पीछे उत्पादन लागत, उचित मूल्य, आय सुरक्षा और बाजार जोखिम से जुड़े वास्तविक आर्थिक प्रश्न भी हैं। बेहतर नीति वही होगी जिसमें उपभोक्ता को राहत देने के साथ किसान को भी न्यूनतम आय सुरक्षा और पारदर्शी बाजार व्यवस्था मिल सके।
प्याज की महंगाई ने राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है। विपक्ष सरकार पर आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने में विफल रहने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार का तर्क है कि उसने समय रहते बफर स्टॉक जारी किया, विशेष परिवहन व्यवस्था शुरू की और रियायती दर पर बिक्री की व्यवस्था की है।
भारतीय राजनीति में प्याज का महत्व असाधारण रहा है। इसका कारण यह है कि प्याज केवल कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की रोजमर्रा की रसोई का हिस्सा है। जब प्याज महंगा होता है तो असर केवल प्याज खरीदने के बिल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भोजन की कुल लागत बढ़ने से महंगाई का असर उपभोक्ता को अधिक तीव्र महसूस होता है। इसी कारण प्याज की कीमतें कई बार आर्थिक मुद्दे से निकलकर राजनीतिक मुद्दा बन जाती हैं।
प्याज के साथ चीनी की कीमतों में तेजी ने चिंता को और बढ़ा दिया है। चीनी की कीमतों पर गन्ने का उत्पादन, चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति, घरेलू उपलब्धता, निर्यात नीति, एथेनॉल उत्पादन और वैश्विक चीनी बाजार जैसे कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। इन सभी के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।
खाद्य नीति में किसी एक क्षेत्र को प्रोत्साहित करने वाला फैसला दूसरे क्षेत्र में आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए चीनी की कीमतों में तेजी को भी व्यापक खाद्य एवं कृषि नीति के संदर्भ में देखना जरूरी है।
इस पूरे संकट को जलवायु परिवर्तन से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता। बेमौसम बारिश, अत्यधिक वर्षा, तापमान में बदलाव और मौसम की बढ़ती अनिश्चितता कृषि कैलेंडर को प्रभावित कर रही है। प्याज जैसी फसल के लिए खेत में उत्पादन पर्याप्त नहीं है; कटाई के बाद वैज्ञानिक भंडारण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भारत में लाखों टन प्याज का उत्पादन होने के बावजूद यदि भंडारण और आपूर्ति व्यवस्था कमजोर रहती है तो उत्पादन का बड़ा हिस्सा नियमित बाजार आपूर्ति में परिवर्तित नहीं हो पाता। इसलिए भविष्य की खाद्य सुरक्षा केवल अधिक उत्पादन का विषय नहीं है। उत्पादन से लेकर भंडारण, परिवहन, मंडी और अंतिम उपभोक्ता तक पूरी मूल्य-श्रृंखला को मजबूत करना होगा।
इस संकट का अंतरराष्ट्रीय आयाम भी महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया के प्रमुख प्याज उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने के लिए भारत जब निर्यात नीति में बदलाव करता है तो उसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। बांग्लादेश, श्रीलंका, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के कुछ बाजारों में भारतीय प्याज की आपूर्ति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए भारत की घरेलू खाद्य नीति का प्रभाव दूसरे देशों के बाजारों पर भी दिखाई दे सकता है।
मौजूदा प्याज संकट का समाधान केवल कुछ दिनों के लिए कांदा एक्सप्रेस चलाने या बफर स्टॉक जारी करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। ये कदम तत्काल राहत के लिए जरूरी हैं, लेकिन दीर्घकालीन समाधान के लिए आधुनिक भंडारण केंद्र, वैज्ञानिक प्याज भंडारण तकनीक, बेहतर ग्रामीण सड़क और रेल कनेक्टिविटी, पारदर्शी मूल्य सूचना, किसानों के लिए जोखिम प्रबंधन और बाजार आधारित आय सुरक्षा को मजबूत करना होगा।
सरकार को ऐसा प्रभावी तंत्र विकसित करना होगा जिसमें कीमतें बहुत नीचे जाने पर किसान पूरी तरह संकट में न आए और कीमतें बहुत ऊपर जाने पर उपभोक्ता भी असहाय न हो। किसान और उपभोक्ता के हितों के बीच यही संतुलन भारत की दीर्घकालीन खाद्य नीति की सबसे बड़ी कसौटी बनेगा।
अतः प्याज की मौजूदा महंगाई भारत के सामने खड़ी एक बड़ी आर्थिक तस्वीर का छोटा लेकिन अत्यंत संवेदनशील हिस्सा है। एक ओर करोड़ों उपभोक्ता सस्ती खाद्य वस्तुओं की अपेक्षा करते हैं, वहीं दूसरी ओर करोड़ों किसान अपनी मेहनत की उचित कीमत चाहते हैं। सरकार के सामने इन दोनों हितों के बीच संतुलन कायम करने की चुनौती है।
कांदा एक्सप्रेस, बफर स्टॉक तथा NCCF, NAFED और केंद्रीय भंडार के माध्यम से बिक्री जैसे उपाय तत्काल राहत दे सकते हैं, लेकिन स्थायी समाधान कृषि आपूर्ति-श्रृंखला के ढांचागत सुधार में ही छिपा है। प्याज और चीनी की कीमतों में एक साथ दिखाई दे रही तेजी यह चेतावनी देती है कि आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा केवल उत्पादन का विषय नहीं रहेगी। यह जलवायु, किसान आय, उपभोक्ता अधिकार, बाजार व्यवस्था और राष्ट्रीय राजनीति के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा होगी।
यदि भारत इस चुनौती से सबक लेकर किसान और उपभोक्ता दोनों के हितों को केंद्र में रखकर दीर्घकालीन खाद्य नीति तैयार करता है, तो आज का ‘रसोई संकट’ कल की अधिक मजबूत, संतुलित और टिकाऊ खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का आधार बन सकता है।
— एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं
गोंदिया, महाराष्ट्र
विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि एवं संगीत माध्यम से जुड़े लेखक
सीए (एटीसी), एडवोकेट
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