Friday, February 27, 2026
Homeकवितासुझावों की भीड़ में खोता विवेक, एक प्रेरक प्रसंग

सुझावों की भीड़ में खोता विवेक, एक प्रेरक प्रसंग

मो. मोइजुद्दीन | राष्ट्र की परम्परा
(रांची, झारखंड)

एक व्यक्ति ने खोली अगरबत्ती की दुकान,
सुगंध से भरी, किस्मत की थी पहचान।
बोर्ड लगाया बाहर उसने सरल सा एक,
“यहाँ सुगंधित अगरबत्तियां मिलती हैं” — नेक।

धंधा चला, ग्राहक आए, बातें हुईं हजार,
एक ने कहा— सुगंधित शब्द है बेकार।
अगरबत्ती में दुर्गंध की कल्पना कौन करे?
मान ली बात, शब्द मिटा, सोच लिया— सुधरे।

अब बोर्ड कहे— यहाँ अगरबत्तियां मिलती हैं,
दूसरा बोला— “यहाँ” क्यों? दुकान यहीं दिखती है।
मान ली सलाह, शब्द फिर हटा दिया,
बोर्ड छोटा होता गया, विवेक सिमटता गया।

फिर किसी ने कहा— “इतना क्यों लिखते हो भाई?
सिर्फ ‘अगरबत्ती’ ही काफी है, सच्चाई!”
मान ली बात, बोर्ड बस एक शब्द रह गया,
व्यापार नहीं, सुझावों का बोझ बढ़ गया।

अंत में आया एक ज्ञानी, शिक्षक का रूप,
कहा— “बोर्ड ही क्यों? दुकान खुद है प्रमाण, स्वरूप!”
बोर्ड हट गया, दुकान मौन हो गई,
पहचान बिना, बिक्री धीरे-धीरे खो गई।

समय बीता, चिंता बढ़ी, व्यापार हुआ मंद,
मित्र आया वर्षों बाद, देखा पूरा प्रबंध।
सब सुनकर बोला— “तू ठगा गया, मित्र!
सबसे पहले जो था, वही था तेरा मंत्र।”

“इतनी बड़ी दुकान और एक बोर्ड नहीं?
लिख देता— यहाँ सुगंधित अगरबत्तियां मिलती हैं — सही!”

शिक्षा (Life Lesson)

जीवन में हर कदम पर मिलेंगे सुझाव,
बिन विशेषज्ञ बने, देंगे ज्ञान का बहाव।
हर सलाह मानोगे, तो राह भटक जाओगे,
अपनी ही समझ से दूर, खुद को खो जाओगे।

हर विषय के लिए सुनो सही विशेषज्ञ की बात,
या अपने अंतरात्मा की सच्ची आवाज़ साथ।
क्योंकि तुम्हें तुमसे बेहतर कोई नहीं जानता,
यही जीवन का सत्य है, यही अनुभव बताता।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments