प्रस्तावना
एपिसोड 11 में हमने सीखा कि धैर्य ही सच्ची विजय का आधार है।अब एपिसोड 12 में भगवान गणेश की एक शास्त्रोक्त, गहन और आज के जीवन से सीधी जुड़ी कथा सामने आती है,जो यह सिखाती है कि सही समय पर लिया गया निर्णय व्यक्ति को ऊँचाइयों तक पहुँचा देता है।भगवान गणेश केवल विघ्नहर्ता ही नहीं,बल्कि निर्णय,बुद्धि और विवेक के अधिष्ठाता देव हैं।यह कथा पुराणों में वर्णित है और आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
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निर्णय की शक्ति—शास्त्रोक्त कथा
कथा का प्रारंभ
एक समय की बात है,देवताओं और ऋषियों के बीच यह प्रश्न उठा कि ऐसा कौन-सा देव है जो हर कार्य के आरंभ में सबसे पहले पूज्य हो।यह प्रश्न केवल सम्मान का नहीं,बल्कि विवेक और निर्णय क्षमता का भी था।देवताओं ने भगवान शिव से इसका समाधान माँगा।शिवजी ने मुस्कराते हुए कहा—“जो सबसे श्रेष्ठ निर्णय ले सकेगा,वही प्रथम पूज्य होगा।”
यह सुनकर सभी देवताओं में हलचल मच गई।कार्तिकेय अपने पराक्रम और वेग पर गर्व करते थे,जबकि गणेश जी अपने शांत स्वभाव और गहन बुद्धि के लिए प्रसिद्ध थे।
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परीक्षा की घोषणा
शिवजी ने घोषणा की—“जो भी पृथ्वी,आकाश और तीनों लोकों की परिक्रमा करके सबसे पहले लौट आएगा,वही प्रथम पूज्य कहलाएगा।”
कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मयूर पर सवार होकर तीव्र गति से निकल पड़े।गणेश जी वहीं शांत बैठे रहे।देवताओं को लगा कि गणेश जी ने प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लिया।
गणेश जी का अद्भुत निर्णय
गणेश जी ने सोचा—“शास्त्रों में माता-पिता को संपूर्ण सृष्टि के समान माना गया है।यदि मैं उनके चरणों की परिक्रमा कर लूँ,तो यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा के समान होगी।”
उन्होंने तुरंत अपने माता-पिता,भगवान शिव और माता पार्वती,की तीन बार परिक्रमा की और हाथ जोड़कर बैठ गए।
यह निर्णय न तो जल्दबाजी का था और न ही अहंकार से भरा।यह शुद्ध विवेक और शास्त्रीय ज्ञान पर आधारित था।
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परिणाम
कुछ समय बाद कार्तिकेय थके हुए लौटे।उन्होंने देखा कि गणेश जी पहले से विराजमान हैं।जब शिवजी ने गणेश जी के निर्णय का रहस्य बताया,तो सभी देवता आश्चर्यचकित रह गए।शिवजी ने घोषणा की—“गणेश का निर्णय ही श्रेष्ठ है।इसीलिए वे प्रथम पूज्य होंगे।”
यहीं से भगवान गणेश को ‘प्रथम पूज्य’ का स्थान प्राप्त हुआ।
कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ
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