प्राचीन भारतीय अभिलेख और मुद्राएं इतिहास लेखन की रीढ़: प्रो. विपुला दुबे

प्राचीन भारतीय अभिलेख एवं मुद्राएं-अभिरुचि कार्यशाला: राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला का शुभारंभ

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर एवं प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय “प्राचीन भारतीय अभिलेख एवं मुद्राएं–अभिरुचि कार्यशाला” राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला का शुभारंभ प्राचीन इतिहास विभाग में हुआ।
कार्यशाला का उद्घाटन मुख्य अतिथि एवं विषय विशेषज्ञ प्रो. विपुला दुबे, पूर्व विभागाध्यक्ष, प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग तथा विशिष्ट अतिथि प्रो. कीर्ति पाण्डेय, संकाय प्रमुख, कला संकाय ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया।
उद्घाटन सत्र में प्रो. विपुला दुबे ने प्राचीन भारतीय अभिलेखों के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि अभिलेख इतिहास परंपरा के संवाहक हैं। द्वितीय सत्र में उन्होंने अशोककालीन अभिलेखों से लेकर मध्यकाल तक अभिलेखों के विकसित स्वरूप पर रोचक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि अभिलेखों के माध्यम से प्रशासनिक प्रक्रिया, सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक चेतना की स्पष्ट जानकारी मिलती है। जेम्स प्रिन्सेप द्वारा 1837–38 ईस्वी में ब्राह्मी लिपि के उद्वाचन से भारत में अभिलेखीय इतिहास लेखन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। अभिलेखों के बिना इतिहास लेखन तार्किक और प्रमाणिक नहीं हो सकता।
कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए प्रो. राजवंत राव ने कहा कि लेखन कला का आरंभ पूर्वांचल में हुआ, जिसके प्रमाण कौड़ीराम–सहगौरा तथा कपिलवस्तु–पिपरहवा से प्राप्त अभिलेख हैं। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारतीय मुद्राएं इतिहास लेखन के अत्यंत प्रमाणिक स्रोत हैं और अभिलेख व मुद्राएं इतिहास संरचना की रीढ़ हैं। सात दिवसीय इस कार्यशाला में प्रतिभागियों को भारतीय अभिलेखों और मुद्राओं के विस्तृत इतिहास से परिचित कराया जाएगा।
कार्यशाला के शुभारंभ अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रो. प्रज्ञा चतुर्वेदी ने मुख्य एवं विशिष्ट अतिथियों का स्वागत किया। प्रो. कीर्ति पाण्डेय ने अपने उद्बोधन में कहा कि अभिलेख और मुद्राओं पर आधारित यह कार्यशाला शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।
कार्यशाला संयोजक डॉ. यशवंत सिंह राठौर, उप निदेशक, राजकीय बौद्ध संग्रहालय ने सात दिवसीय कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि अभिलेखों एवं मुद्राओं के माध्यम से इतिहास लेखन सर्वाधिक प्रमाणिक होता है। कार्यशाला में अभिलेखों के प्रकार, लिपियों का विकास, मुद्राओं के विकास जैसे विषयों पर विस्तृत प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने जानकारी दी कि 04 फरवरी से 09 फरवरी 2026 तक कार्यशाला का शेष आयोजन प्रतिदिन पूर्वाह्न 11:30 बजे से राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर के यशोधरा सभागार में होगा।
कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर गोरखपुर परिक्षेत्र के लगभग 80 प्रतिभागियों सहित प्रो. नन्दिता सिंह, प्रो. दिग्विजयनाथ मौर्य, प्रो. प्यारे लाल मिश्र, डॉ. विनोद कुमार, डॉ. मणिन्द्र यादव सहित अनेक शिक्षाविदों की उपस्थिति रही।

Editor CP pandey

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