बच्चों और युवाओं में पर्यावरणीय संस्कार क्यों जरूरी

आस्था की रोशनी या ज़हरीला धुआँ?—त्योहारों में बढ़ता प्रदूषण और हमारी सामाजिक जिम्मेदारी

भारत को त्योहारों की भूमि कहा जाता है। यहाँ हर पर्व आस्था, परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक होता है। दीपावली की रोशनी, होली के रंग, दुर्गा पूजा की भव्यता और गणेश उत्सव का उल्लास—ये सभी हमारी पहचान हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में त्योहारों में प्रदूषण एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बनकर उभरा है। पटाखों से उठता ज़हरीला धुआँ, नदियों में विसर्जन से बढ़ता जल प्रदूषण और तेज़ ध्वनि विस्तारक यंत्रों से होने वाला शोर अब उत्सवों की खुशी पर भारी पड़ने लगा है। सवाल यह नहीं है कि त्योहार मनाए जाएँ या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम उन्हें जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ मना सकते हैं?

त्योहारों में प्रदूषण: बढ़ता वायु संकट

त्योहारों के दौरान खासकर दीपावली पर वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) कई शहरों में खतरनाक या गंभीर श्रेणी में पहुँच जाता है। पटाखों से निकलने वाला धुआँ सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों से हवा को जहरीला बना देता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ घंटों की आतिशबाजी का असर कई दिनों तक बना रहता है। बच्चों में अस्थमा, बुजुर्गों में सांस की तकलीफ और हृदय रोगियों में जटिलताएँ बढ़ जाती हैं। साफ शब्दों में कहें तो त्योहारों में प्रदूषण केवल पर्यावरण का ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी संकट है।

धार्मिक परंपराएँ और जल प्रदूषण

भारत में नदियाँ केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि आस्था की धुरी हैं। मूर्ति विसर्जन सदियों पुरानी परंपरा है, लेकिन बदलते समय के साथ इसमें प्रयुक्त सामग्री पर्यावरण के लिए खतरा बन गई है। प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियाँ, रासायनिक रंग, थर्माकोल और प्लास्टिक सजावट जलाशयों में घुलकर जलीय जीवन को नष्ट कर देती हैं।
जल प्रदूषण का सीधा असर पीने के पानी, कृषि और जैव विविधता पर पड़ता है। कई नदियाँ, जिन्हें हम पूजा के योग्य मानते हैं, आज खुद संरक्षण की मांग कर रही हैं। यह विरोधाभास हमारे सामाजिक विवेक पर सवाल खड़ा करता है।

ध्वनि प्रदूषण: अनदेखी लेकिन खतरनाक समस्या

त्योहारों में तेज़ डीजे, लाउडस्पीकर और पटाखों की आवाज़ ध्वनि प्रदूषण को चरम पर पहुँचा देती है। इसका असर सिर्फ सुनने की क्षमता पर ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती है, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को परेशानी होती है, और छोटे बच्चों में चिड़चिड़ापन व भय पैदा होता है। नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन अक्सर औपचारिक बनकर रह जाता है।

आस्था और पर्यावरण: टकराव नहीं, संतुलन जरूरी

पर्यावरण विशेषज्ञ और सामाजिक चिंतक मानते हैं कि आस्था और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। इको-फ्रेंडली मूर्तियाँ, मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का उपयोग, सीमित और सामूहिक आतिशबाजी, ग्रीन पटाखे और नियंत्रित ध्वनि स्तर—ये सभी व्यवहारिक विकल्प हैं।
कई शहरों में “ग्रीन फेस्टिवल” की अवधारणा ने यह साबित किया है कि त्योहारों में प्रदूषण को कम करते हुए भी उल्लास और परंपरा को जीवित रखा जा सकता है।

प्रशासन, समाज और नागरिकों की संयुक्त जिम्मेदारी

सरकार नियम बनाती है, लेकिन उनका प्रभाव तभी दिखता है जब समाज उन्हें अपनाए। स्थानीय प्रशासन, धार्मिक समितियाँ, सामाजिक संगठन और मीडिया—सभी की भूमिका अहम है।
स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा, सामुदायिक जागरूकता अभियान और स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक उत्सव मॉडल अपनाकर बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। नागरिकों का छोटा-सा निर्णय—जैसे कम पटाखे जलाना या इको-फ्रेंडली विकल्प चुनना—समूह में मिलकर बड़ा असर पैदा करता है।

त्योहार खुशियाँ बाँटने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए होते हैं, न कि जीवन और पर्यावरण को संकट में डालने के लिए। सच्ची आस्था वही है जो प्रकृति, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करे। अगर आज हमने त्योहारों में प्रदूषण को लेकर जिम्मेदारी नहीं दिखाई, तो भविष्य में हमारे उत्सव केवल यादों तक सीमित रह जाएँगे। अब समय आ गया है कि हम रोशनी को ज़हरीले ध

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