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जब अधिकारों के साथ कर्तव्यों की समझ विकसित होती है, तब राष्ट्रहित सर्वोपरि बनता है

चंद्रकांत सी. पूजारी, गुजरात

किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की मजबूती केवल उसके संविधान, कानून या शासन-प्रणाली पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके नागरिकों की सोच, आचरण और कर्तव्य-बोध पर भी समान रूप से आधारित होती है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता में निहित होती है और जनता तभी सशक्त बनती है, जब वह अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे और उनका पालन करे। अधिकार और कर्तव्य नागरिक जीवन के दो ऐसे महत्वपूर्ण पहलू हैं, जो एक-दूसरे के पूरक हैं और जिनका संतुलन ही एक स्वस्थ, समरस और सुदृढ़ समाज की नींव रखता है।

जब व्यक्ति केवल अपने अधिकारों की मांग करता है और अपने कर्तव्यों से विमुख रहता है, तब समाज में असंतुलन, अव्यवस्था और टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। ऐसी सोच सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करती है और आपसी अविश्वास को जन्म देती है। इसके विपरीत, जब नागरिक अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समान महत्व देते हैं, तब वे जाति, धर्म, भाषा और वर्ग की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के बारे में सोचने लगते हैं।

भारतीय संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्रदान किए हैं, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या सामाजिक वर्ग से संबंधित क्यों न हो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार हमारे लोकतंत्र की पहचान हैं। लेकिन ये अधिकार तभी सुरक्षित और सार्थक रह सकते हैं, जब उनके साथ कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन किया जाए। कर्तव्य हमें यह सिखाते हैं कि हमारी स्वतंत्रता वहीं तक है, जहां तक दूसरों की स्वतंत्रता बाधित न हो।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A में वर्णित मौलिक कर्तव्य इसी संतुलन का जीवंत उदाहरण हैं। वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़े गए इन कर्तव्यों में प्रमुख है—भारत के सभी लोगों के बीच धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय या सांप्रदायिक भेदभाव से ऊपर उठकर सद्भाव और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना। यह कर्तव्य नागरिकों को जाति-धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठने और राष्ट्र की एकता व अखंडता को सर्वोपरि मानने की प्रेरणा देता है।

जब कोई नागरिक इस कर्तव्य का पालन करता है, तो वह अपने अधिकारों का प्रयोग जिम्मेदारी और विवेक के साथ करता है। समाज में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं, जब लोग आपदा, सामाजिक कार्यों या दैनिक जीवन में जाति और धर्म से ऊपर उठकर एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यही व्यवहार राष्ट्रहित की वास्तविक अभिव्यक्ति है।

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जब नागरिक यह समझने लगता है कि उसके अधिकार दूसरों के कर्तव्यों से जुड़े हैं और दूसरों के अधिकार उसके स्वयं के कर्तव्यों से, तब समाज में आपसी सम्मान, सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना विकसित होती है। यही भावना एक सभ्य और समरस समाज का निर्माण करती है।
वर्तमान समय में जाति और धर्म के आधार पर समाज का विभाजन एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। कई बार व्यक्तिगत स्वार्थ या समूह विशेष के हितों को राष्ट्रहित से ऊपर रख दिया जाता है। इसका प्रमुख कारण कर्तव्य-बोध की कमी है। जब नागरिक केवल अपने अधिकारों पर जोर देते हैं, लेकिन सामाजिक सद्भाव, सहिष्णुता और जिम्मेदार व्यवहार जैसे कर्तव्यों को नजरअंदाज करते हैं, तब मतभेद और तनाव बढ़ते हैं।

इसके विपरीत, जो नागरिक अपने कर्तव्यों को समझते हैं, वे यह जानते हैं कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और शांति बनाए रखना केवल सरकार की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है। वे यह भी समझते हैं कि आलोचना का अधिकार विवेक, मर्यादा और जिम्मेदारी के साथ प्रयोग किया जाना चाहिए।

कर्तव्य-बोध व्यक्ति को व्यापक और दूरदर्शी दृष्टिकोण प्रदान करता है। वह यह समझने लगता है कि राष्ट्र केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं का सुंदर समन्वय है। जब नागरिक यह स्वीकार करता है कि देश की प्रगति में सभी वर्गों का योगदान आवश्यक है, तब जाति और धर्म के भेद स्वतः ही गौण हो जाते हैं।

इस संदर्भ में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि शिक्षा केवल डिग्री और रोजगार तक सीमित न रहकर नैतिक मूल्यों, संवैधानिक आदर्शों और नागरिक कर्तव्यों की समझ विकसित करे, तो आने वाली पीढ़ी अधिक जागरूक, संवेदनशील और राष्ट्रनिष्ठ बनेगी। परिवार, विद्यालय और समाज—तीनों की जिम्मेदारी है कि बच्चों में यह संस्कार विकसित किए जाएं कि अधिकारों के साथ कर्तव्यों का पालन भी अनिवार्य है।

अंततः कहा जा सकता है कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। केवल अधिकारों की चर्चा से न तो सशक्त समाज का निर्माण संभव है और न ही मजबूत राष्ट्र का। जब नागरिक कानून का पालन करते हैं, दूसरों के प्रति सम्मान रखते हैं, सामाजिक सौहार्द बनाए रखते हैं और राष्ट्र की एकता को सर्वोपरि मानते हैं, तब वे जाति-धर्म के संकीर्ण भेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को अपना ध्येय बना लेते हैं। यही सोच एक सशक्त, एकजुट और प्रगतिशील भारत की सच्ची नींव रखती है।

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Karan Pandey

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