Saturday, January 24, 2026
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“जब गणेश युद्ध नहीं, विवेक से विजयी हुए”

🕉️ अहंकार का क्षय और विवेक का उदय — शास्त्रोक्त गणेश कथा जहाँ गणेश केवल देव नहीं, आत्मा की विजय बन जाते हैं


यह कथा समाप्त नहीं होती।
यह हर मनुष्य के भीतर चलती है।
हर बार जब आप धैर्य चुनते हैं,
हर बार जब आप अहंकार त्यागते हैं—
गणेश विजयी होते हैं।हमने जाना कि कैसे गणेश तत्व केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक शास्त्रोक्त पद्धति है।
अब एपिसोड 10 में हम उस गूढ़ कथा में प्रवेश करते हैं जहाँ अहंकार का विसर्जन और विवेक की स्थापना होती है। यह कथा गणेश पुराण, मुद्गल पुराण और स्कंद पुराण में वर्णित प्रसंगों से प्रेरित है और आज के मनुष्य के अंतर्मन से सीधा संवाद करती है।

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शास्त्रोक्त भूमिका : गणेश क्यों “विवेक के देवता” हैं?
शास्त्रों में भगवान गणेश को केवल विघ्नहर्ता नहीं कहा गया, बल्कि—
“बुद्धि-विद्या-विवेकाणां नायकः गणनायकः”
— गणेश पुराण
अर्थात गणेश बुद्धि, विद्या और विवेक के अधिपति हैं।
जहाँ अहंकार अंधकार है, वहीं गणेश तत्व प्रकाश है।
आज का युग बाह्य उपलब्धियों का है—पद, प्रतिष्ठा, सत्ता और प्रदर्शन।
पर शास्त्र कहते हैं—
👉 जो स्वयं को जीत ले, वही सच्चा विजेता है।
📜 शास्त्रोक्त कथा : “अहंकारासुर का पतन और विवेक की स्थापना”
(गणेश पुराण से प्रेरित कथा)
प्राचीन काल में अहंकारासुर नामक एक शक्तिशाली असुर हुआ।
उसने कठोर तप कर ब्रह्मा से वरदान पाया—

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👉 “मेरा कोई भी बाह्य शत्रु मुझे पराजित न कर सके।”
वरदान मिलते ही अहंकारासुर का नाम ही उसका स्वभाव बन गया।
वह देवताओं, ऋषियों और यहाँ तक कि स्वयं धर्म का भी उपहास करने लगा।
देवलोक में संकट छा गया।
देवगण ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए।
त्रिदेव बोले—
“इस असुर का अंत कोई शस्त्र नहीं कर सकता,
क्योंकि इसका मूल शत्रु बाहर नहीं—भीतर है।”
तभी त्रिदेवों ने भगवान गणेश का आवाहन किया।

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🐘 गणेश का आगमन : युद्ध नहीं, संवाद
गणेश युद्ध के लिए नहीं आए।
न कोई अस्त्र, न कोई सेना।
उन्होंने अहंकारासुर से केवल एक प्रश्न किया—
“तू कौन है?”
अहंकारासुर गर्जना कर बोला—
“मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, मैं ही सब कुछ हूँ!”
गणेश मुस्कुराए और बोले—
“जो ‘मैं’ में डूबा हो,
वह ‘हम’ को कभी नहीं जान सकता।”
यह सुनते ही अहंकारासुर विचलित हो गया।
पहली बार उसके भीतर प्रश्न उठा—

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👉 “यदि मैं ही सब कुछ हूँ, तो भय क्यों है?”
🔥 अहंकार का क्षय : भीतर का युद्ध
शास्त्र कहते हैं—
👉 गणेश बाह्य युद्ध नहीं करते, वे भीतर परिवर्तन करते हैं।
गणेश ने अहंकारासुर को कोई दंड नहीं दिया।
उन्होंने उसे स्वविवेक का दर्पण दिखाया।
जैसे ही अहंकारासुर ने स्वयं को देखा—
उसकी शक्ति क्षीण होने लगी।
उसका अहंकार ही उसका सबसे बड़ा विघ्न था।
अंततः अहंकारासुर भूमि पर गिर पड़ा और बोला—
“हे गणनायक!
आज ज्ञात हुआ कि मेरा सबसे बड़ा शत्रु मैं स्वयं था।”
गणेश ने उसे क्षमा दी और कहा—
“जहाँ अहंकार का विसर्जन होता है,
वहीं से भक्ति और बुद्धि का जन्म होता है।”

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🌺 कथा का गूढ़ अर्थ : आज का मनुष्य और गणेश तत्व
यह कथा केवल पुराणों की नहीं—
यह कॉर्पोरेट ऑफिस, राजनीति, परिवार, समाज—हर जगह घट रही है।
जब हम सुनने से पहले बोलते हैं — अहंकारासुर जागता है
जब हम जीत से अधिक सत्य को चुनते हैं — गणेश प्रकट होते हैं
जब हम धैर्य रखते हैं — विघ्न स्वयं हट जाते हैं
👉 गणेश कोई बाहरी देव नहीं,
वे भीतर की चेतना हैं।
🪔 गणेश की महिमा : समानता और समरसता के देव
शास्त्रों में गणेश का स्वरूप ही एक संदेश है—
हाथी का सिर → स्मरण शक्ति और धैर्य
बड़ा पेट → सबको स्वीकार करने की क्षमता
छोटे नेत्र → सूक्ष्म विवेक
मूषक वाहन → इच्छाओं पर नियंत्रण
गणेश का संदेश है—
👉 “सब समान हैं, अहंकार ही भेद पैदा करता है।”
📖 आज के युग के लिए शास्त्रोक्त शिक्षा
समस्या नहीं, दृष्टि बदलो
प्रतिक्रिया नहीं, विवेक चुनो
अहंकार नहीं, स्वीकार्यता अपनाओ
जीत नहीं, सत्य को प्राथमिकता दो
जहाँ विवेक है, वहाँ गणेश हैं।
जहाँ अहंकार है, वहाँ विघ्न हैं।
🔔 निष्कर्ष : यह कथा समाप्त नहीं होती…
यह कथा हर उस क्षण चलती है—
जब आप क्रोध के स्थान पर करुणा चुनते हैं।
जब आप स्वयं को सही नहीं, सत्य मानते हैं।
हर बार गणेश विजयी होते हैं।

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