शिक्षा डेस्क- राष्ट्र की परम्परा लेखक – सोमनाथ मिश्र
शिक्षा को सामाजिक समानता औरआत्मनिर्भरता का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है। लेकिन भारत जैसे देश में, जहाँ “सबके लिए शिक्षा” को नीति और नारे दोनों स्तरों पर स्वीकार किया गया है, वहीं दिव्यांग छात्रों के लिए शिक्षा आज भी संघर्ष का दूसरा नाम बनी हुई है। काग़ज़ों में मौजूद योजनाएँ, अधिकार कानून और सरकारी घोषणाएँ ज़मीनी स्तर पर अक्सर अधूरी दिखाई देती हैं। सवाल यही है—क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में दिव्यांग छात्रों की ज़रूरतों के अनुरूप समावेशी बन पाई है?
क़ानून और नीतियाँ: मौजूद हैं, पर प्रभाव सीमित
भारत में दिव्यांग छात्रों के अधिकारों को लेकर दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, समग्र शिक्षा अभियान और उच्च शिक्षा में आरक्षण जैसे प्रावधान मौजूद हैं। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शारीरिक, दृष्टि, श्रवण या बौद्धिक दिव्यांगता से जूझ रहे छात्र भी मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ सकें। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इन नीतियों का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुँच पाता।
कई स्कूलों और कॉलेजों में आज भी बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं की भारी कमी है। रैम्प, लिफ्ट, सुलभ शौचालय और व्हीलचेयर-अनुकूल कक्षाएँ अब भी अपवाद हैं, जबकि इन्हें सामान्य मानक होना चाहिए।
भौतिक अवसंरचना: प्रवेश ही सबसे बड़ी बाधा
शारीरिक रूप से दिव्यांग छात्रों के लिए शिक्षा संस्थानों तक पहुँचना ही सबसे पहला संघर्ष है। ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में स्थित सरकारी स्कूलों की इमारतें अक्सर पुरानी हैं, जिनमें दिव्यांग-अनुकूल निर्माण पर ध्यान नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप कई छात्र नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पाते या बीच में पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
उच्च शिक्षा संस्थानों में स्थिति थोड़ी बेहतर दिखती है, लेकिन वहाँ भी सभी विभागों और हॉस्टलों में समान सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।
शैक्षणिक सामग्री और सहायक सुविधाओं की कमी
दृष्टिबाधित छात्रों के लिए ब्रेल पुस्तकें, ऑडियो कंटेंट और स्क्रीन रीडर जैसी तकनीक बेहद आवश्यक है। श्रवण बाधित छात्रों को साइन लैंग्वेज दुभाषियों और सबटाइटल आधारित सामग्री की ज़रूरत होती है। लेकिन अधिकतर शैक्षणिक संस्थानों में ये सुविधाएँ सीमित हैं।
परीक्षाओं में अतिरिक्त समय, लेखक (स्क्राइब) या डिजिटल सहायक जैसे प्रावधान कानून में तो शामिल हैं, लेकिन व्यवहार में इन्हें हासिल करना आसान नहीं। छात्रों को प्रमाणपत्र, आवेदन और अनुमति की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जो मानसिक दबाव भी बढ़ाती है।
शिक्षक प्रशिक्षण और मानसिकता का सवाल
समावेशी शिक्षा की सफलता में शिक्षकों की भूमिका सबसे अहम होती है। दुर्भाग्य से, अधिकांश शिक्षक दिव्यांगता से जुड़े विशेष प्रशिक्षण से वंचित रहते हैं। नतीजतन, कई बार वे छात्रों की क्षमताओं को समझने के बजाय उन्हें कमजोर या बोझ समझ लेते हैं।
यह सोच छात्रों के आत्मविश्वास और सीखने की गति दोनों को प्रभावित करती है। ज़रूरत है कि शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में समावेशी शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाए, ताकि कक्षा का माहौल सभी के लिए समान और सम्मानजनक हो।
डिजिटल शिक्षा: अवसर भी, बाधा भी
कोविड-19 के बाद डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा मिला, लेकिन अधिकांश ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिव्यांग-अनुकूल नहीं हैं। वेबसाइट्स पर स्क्रीन रीडर सपोर्ट, कैप्शन, आसान नेविगेशन जैसी सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में तकनीक, जो समावेशन का साधन बन सकती थी, कई दिव्यांग छात्रों के लिए नई बाधा बन गई।
छात्रवृत्तियाँ और सरकारी सहायता: जानकारी का अभाव
सरकार द्वारा दिव्यांग छात्रों के लिए कई छात्रवृत्ति योजनाएँ चलाई जा रही हैं, लेकिन जागरूकता की कमी और जटिल प्रक्रियाओं के कारण अनेक जरूरतमंद छात्र इनका लाभ नहीं उठा पाते। स्कूल और कॉलेज स्तर पर परामर्श और मार्गदर्शन की व्यवस्था मज़बूत की जानी चाहिए, ताकि कोई भी छात्र सिर्फ जानकारी के अभाव में पीछे न रह जाए।
सहानुभूति नहीं, अधिकार आधारित व्यवस्था
दिव्यांग छात्रों के लिए समावेशी शिक्षा सहानुभूति का विषय नहीं, बल्कि अधिकार और सम्मान का सवाल है। जब तक नीतियाँ काग़ज़ों से निकलकर कक्षाओं, परीक्षाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक नहीं पहुँचेंगी, तब तक “सबके लिए शिक्षा” केवल एक नारा ही बना रहेगा।
समावेशी अवसंरचना, प्रशिक्षित शिक्षक, सुलभ तकनीक और सरल प्रक्रियाएँ—इन चार स्तंभों पर ही एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था खड़ी हो सकती है, जहाँ दिव्यांग छात्र भी बिना बाधा अपने सपनों को आकार दे सकें।
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