हमारा कर्म ही हमारा भविष्य हैं- धार्मिक, सामाजिक आध्यात्मिक और राजनीतिक दृष्टि से एक गहन विश्लेषण
परिश्रम,अनुशासन और नवाचार का बीज बोनें वाले,विश्व मेंअग्रणी बने-लापरवाही, भ्रष्टाचार और विभाजन का बीज बोए पिछड़ गए, कड़वी सच्चाई- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर मानव जीवन का सबसे बड़ा सत्य यह है कि कर्म के बिना कोई फल नहीं। “जो बोएगा वही पाएगा, तेरा किया आगे आएगा”यह केवल एक कहावत नहीं बल्कि समूचे जीवन का सिद्धांत है।यह वाक्य धार्मिक,सामाजिक,आध्यात्मिक और राजनीतिक, चारों स्तरों पर समान रूप से लागू होता है। हर धर्म, हर दर्शन और हर सभ्यता ने किसी न किसी रूप में कर्म के परिणाम को स्वीकार किया है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि आज जब दुनिययाँ तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रही है, तब यह पंक्ति हमें चेतावनी देती है कि हर क्रिया का परिणाम निश्चित है,चाहे वह व्यक्ति का कर्म हो या राष्ट्र की नीतियाँ।
साथियों बात अगर हम इस बात को धार्मिक दृष्टिकोण से देखकर समझने की करें तो, ईश्वर न्यायकारी है, पर कर्म निर्णायक हैं, हर धर्म की आत्मा में कर्म का सिद्धांत रचा-बसा है।हिंदू धर्म में कहा गया है,“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है,फल की चिंता उसे नहीं करनी चाहिए, क्योंकि फल तो उसके कर्मों का ही परिणाम है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट किया कि अच्छे कर्म शुभ फल लाते हैं, और अधर्म विनाश का कारण बनता है।बौद्ध धर्म में भी यही सिद्धांत “कर्म” और “कर्मफल” के रूप में समझाया गया है,कि प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों से ही पुनर्जन्म या मुक्ति प्राप्त करता है।इस्लाम में भी कुरान कहता है कि “हर आत्मा अपने कर्मों के बदले जवाबदेह होगी”। इसी प्रकार ईसाई धर्म में यह वाक्य मिलता है“एस यू सॉव, सो शेल्ल यू रीप.” यानी जो तुम बोओगे, वही काटोगे,इन सब धर्मों का निष्कर्ष यही है कि ईश्वर निष्पक्ष है, परंतु कर्म ही भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
साथियों बात अगर हम इस बात को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझने की कोशिश करें तो,कर्म ही आत्मा की यात्रा का साधन, आध्यात्मिकता का उद्देश्य केवल मोक्ष या मुक्ति नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार है। आत्मा शाश्वत है, परंतु उसके अनुभव कर्मों से निर्मित होते हैं।
यदि कोई व्यक्ति प्रेम, सत्य और दया का बीज बोता है, तो उसकी आत्मा शांति और आनंद का फल प्राप्त करती है। परंतु यदि वह घृणा, लोभ और हिंसा का बीज बोता है, तो उसका परिणाम पीड़ा और अशांति के रूप में सामने आता है। आध्यात्मिक दृष्टि से कर्म योग ही जीवन का परम मार्ग है,जब व्यक्ति बिना स्वार्थ, बिना अहंकार, केवल कर्तव्य भावना से कार्य करता है, तब वह ईश्वर के समीप पहुँचता है।आज के युग में जब तनाव, प्रतिस्पर्धा और असंतोष बढ़ गया है, तब यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है कि मनुष्य का प्रत्येक कर्म उसके भीतर ऊर्जा के रूप में अंकित होता है। वही ऊर्जा भविष्य में सुख या दुख के रूप में उसे लौटती है।
साथियों बात अगर हम इस बात को सामाजिक दृष्टिकोण से समझने की करें तो, जैसा समाज बोएगा, वैसा ही फल पाएगा, समाज व्यक्तियों से बनता है, और व्यक्तियों के कर्मों का सम्मिलित प्रभाव ही समाज की दिशा तय करता है।,यदि समाज शिक्षा, समानता, और सेवा का बीज बोता है, तो वह प्रगति, शांति और भाईचारे का फल पाता है।पर यदि समाज जातिवाद, भ्रष्टाचार, हिंसा और असहिष्णुता का बीज बोता है, तो उसका परिणाम अव्यवस्था, गरीबी और विघटन के रूप में प्रकट होता है।भारत जैसे देश में, जहाँ “वसुधैव कुटुम्बकम्” का आदर्श रहा है, वहां आज भी यह पंक्ति सामाजिक नैतिकता की रीढ़ है।हर नागरिक यदि अपने स्तर पर ईमानदारी, सह-अस्तित्व और सेवा की भावना अपनाए,तो राष्ट्र स्वयं बदल जाएगा सामाजिक विज्ञान कहता है कि “सामूहिक कर्म संस्कृति बनाते हैं”, और संस्कृति राष्ट्र की पहचान। इसलिए समाज का प्रत्येक कदम आने वाली पीढ़ियों का बीज है,जैसा आज हम बो रहे हैं, वैसा ही कल हमारा समाज पाएगा।
साथियों बातें कर हम इस बात को राजनीतिक दृष्टिकोण से समझने की करें तो,राजनीति में भी कर्मफल का अटल नियम हैँ,राजनीति वह मंच है जहाँ राष्ट्र का भाग्य लिखा जाता है। परंतु यहाँ भी कर्म का सिद्धांत उतना ही प्रबल है।जो नेता जनता के विश्वास को तोड़ते हैं, जो सत्ता के लिए झूठ और छल का सहारा लेते हैं,उन्हें इतिहास भुला देता है।राजनीतिक इतिहास साक्षी है कि जिन शासकों ने न्याय, सेवा और जनहित का बीज बोया, वे युगों-युगों तक पूजे गए।महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा का बीज बोया, और आज भी उनका नाम मानवता का प्रतीक है। वहीं, जिन तानाशाहों ने अत्याचार और अहंकार का बीज बोया, उन्हें इतिहास ने धूल में मिला दिया। आधुनिक राजनीति में भी “कर्म का फल” तत्काल या दीर्घकाल में सामने आता है। जो सरकारें जनता के हित में कार्य करती हैं, उन्हें पुनः जनादेश मिलता है; और जो केवल वादों का बीज बोती हैं, वे पराजित होती हैं।इसलिए राजनीति में भी यह सिद्धांत अमर है,“तेरा किया आगे आएगा।” राजनीतिक नैतिकता और कर्मफल का सन्देश-जब राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का साधन बन जाए, तब “कर्मफल सिद्धांत” सबसे बड़ा सुधारक सिद्ध होता है।राजनेता, जो आज झूठे वादे बोते हैं, उन्हें कल जनता की नाराज़गी का फल मिलता है।जो नेता सेवा और समर्पण बोते हैं, उन्हें इतिहास सम्मान देता है।भारत, अमेरिका, जापान, दक्षिण अफ्रीका या ब्रिटेन,हर लोकतंत्र में यह नियम समान रूप से लागू है कि जनता वही पाती है, जो उसने चुना है; और नेता वही पाते हैं, जो उन्होंने बोया है।
साथियों बात अगर हम कर्म, भाग्य और विज्ञान ऊर्जा के परिपेक्ष में के संरक्षण का सिद्धांत को समझने की करें तो
यह सिद्धांत केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी सत्य है।भौतिकी का“एनर्जी कंसर्वेशन लॉ ”कहता है कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदलती है।ठीक वैसे ही मनुष्य के कर्म भी ऊर्जा के रूप में ब्रह्मांड में अंकित रहते हैं। जबव्यक्ति कोई अच्छा या बुरा कार्य करता है, तो उसकी ऊर्जा लौटकर उसी के जीवन में किसी रूप में प्रभाव डालती है।आधुनिक मनोविज्ञान भी मानता है कि व्यक्ति का व्यवहारिक कर्म उसकी मानसिक स्थिति का दर्पण होता है।जो व्यक्ति नकारात्मक कर्म करता है, वह भीतर से अशांत रहता है। जो व्यक्ति सकारात्मक कर्म करता है, उसके चेहरे पर आत्मविश्वास और संतोष झलकता है।बहुत से लोग अपने जीवन की कठिनाइयों को भाग्य या किस्मत पर डाल देते हैं। परंतु वास्तव में भाग्य भी पूर्व कर्मों का परिणाम है।गीता में कहा गया है कि “कर्म बीज है और भाग्य उसका फल।” यदि कोई व्यक्ति आलस्य, अज्ञान या भय का बीज बोता है, तो उसका भाग्य उसी के अनुसार फल देता है।कर्मशील व्यक्ति अपना भाग्य स्वयं गढ़ता है। राष्ट्र भी यही सिद्धांत अपनाते हैं, जिन्होंने परिश्रम, अनुशासन और नवाचार का बीज बोया, वे विश्व में अग्रणी बने; जिन्होंने लापरवाही, भ्रष्टाचार और विभाजन का बीज बोया, वे पिछड़ गए।
साथियों बात अगर हम इस बात को वैश्विक स्तर पर आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझने की करें तो वैश्विक स्तर पर कर्म का प्रभाव- आज विश्व एक “ग्लोबल विलेज” बन चुका है। एक देश के कर्म दूसरे देश को भयंकर प्रभावित करते हैं।जलवायु परिवर्तन का भयंकर युद्ध,आतंकवाद या शांति,सब किसी न किसी राष्ट्र या समूह के कर्मों का परिणाम हैं।जो देश पर्यावरण की अनदेखी करते हैं,वेप्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हैं।जो राष्ट्र शांति और सहयोग की नीति अपनाते हैं, वे स्थिरता और समृद्धि का फल पाते हैं।इस प्रकार “जैसी करनी वैसी भरनी” केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे वैश्विक समाज का नियम बन चुका है।मानवता के स्तरपर,कर्म का सार्वभौमिक संदेश-कर्म का यह सिद्धांत मानवता के लिए सबसे बड़ा नैतिक मार्गदर्शन है। यह कहता है कि हर मनुष्य अपने कर्मों से ही ईश्वर का प्रतिनिधि बन सकता है।यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में सत्य, करुणा और सेवा का बीज बोए, तो पूरी पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है।“तेरा किया आगे आएगा”,यह हमें चेताता है कि हमारे हर शब्द, हर विचार और हर कार्य का असर इस सृष्टि पर पड़ता है।इसलिए जीवन में विवेक और संवेदना का बीज बोना ही सच्चा धर्म है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे कि कर्म का बीज, जीवन का फल,अंततः यह कहा जा सकता है कि “जो बोएगा वही पाएगा” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत नियम है।धर्म इसे ईश्वर का न्याय कहता है, समाज इसे नैतिकता का आधार, अध्यात्म इसे आत्म- साक्षात्कार का मार्ग, और राजनीति इसे उत्तरदायित्व का दर्पण।यदि हम चाहते हैं कि हमारा भविष्य सुखमय, राष्ट्र समृद्ध और विश्व शांतिपूर्ण बने, तो हमें आज ही सद्कर्म का बीज बोना होगा।क्योंकि जैसा कर्म हम करेंगे, वैसा ही परिणाम हमें मिलेगा, “तेरा किया आगे आएगा, सुख- दुख है फल कर्मों का, जैसी करनी वैसी भरनी।”
-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
