धीरे चलिए, वरना जीवन की रफ्तार बन जाएगी काल—पुरानी सूक्तियों को न मानने की लापरवाही ले रही जानें

✍️ कैलाश सिंह

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)।आधुनिक समय की तेज रफ्तार संस्कृति लोगों की जान पर भारी पड़ रही है। सड़क सुरक्षा से जुड़ी पुरानी सूक्तियां—धीरे चले, सुरक्षित रहें —आज सिर्फ पोस्टरों और दीवारों पर चिपकी हुई एक औपचारिक लाइन बनकर रह गई हैं। हकीकत यह है कि इन्हें न मान पाने की लापरवाही अब मौत का कारण बन रही है। जिले में बीते महीनों में बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं इस सच्चाई को और भी भयावह रूप में सामने ला रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क पर तीव्र गति और लापरवाही से वाहन चलाने का चलन खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। ग्रामीण इलाकों से लेकर राष्ट्रीय राजमार्ग तक, जहां थोड़ा साफ रास्ता मिलता है, लोग एक्सीलेटर को पैरों तले कुचल देते हैं। परिणाम—दुर्घटनाएं ही नहीं, पूरे परिवार तबाह।पिछले कुछ हफ्तों के आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ है कि अधिकांश हादसों की जड़ गति है। तेज रफ्तार में नियंत्रण खोना, ओवरटेकिंग में जल्दबाजी, मोबाइल पर बात करना और हेलमेट/सीटबेल्ट न लगाना जैसे कारण रोजाना जिंदगी लील रहे हैं। पुलिस और प्रशासन की चेतावनियां भी अब लोगों की दिनचर्या में शामिल लापरवाह आदतों के सामने बेअसर होती दिख रही हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क सुरक्षा के नियम केवल कागजों और घोषणाओं में हैं। न तो जागरूकता अभियान नियमित रूप से हो रहे हैं और न ही सड़कों पर सख्त निगरानी परिणामस्वरूप, हादसे बढ़ रहे हैं और परिवारों में मातम। विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि यदि अब भी लोग अपने व्यवहार में बदलाव नहीं लाते, तो आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। उनकी साफ चेतावनी है—रफ्तार रोमांच हो सकती है, लेकिन जिंदगी उससे कहीं ज्यादा कीमती है।लोगों की बेपरवाही, प्रशासन की लचर व्यवस्था और नियमों की अनदेखी मिलकर एक ऐसी त्रासदी का रूप ले चुकी है जो हर घर को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है। क्या हम जीवन की असली कीमत भूल बैठे हैं?

Karan Pandey

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