गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग में आयोजित “पेटेंट से प्रोडक्ट तक” प्रदर्शनी में शोध को व्यावहारिक उत्पाद में बदलने के नवाचार दिखाए गए। कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने नवाचारों का अवलोकन कर सराहना की।
प्रदर्शनी में तरल जैविक खाद (वर्मीवाश) बनाने की विधि प्रदर्शित की गई। यह विधि कम लागत, पर्यावरण-अनुकूल और छोटे किसानों के लिए लाभकारी है। वर्मीवाश को विशेष यंत्र से फिल्टर कर फसलों पर छिड़काव किया जाता है। 3–4 बार छिड़काव से फसलों की वृद्धि, रोग प्रतिरोधक क्षमता और उत्पादन बढ़ता है। इसमें नाइट्रोजन, पोटैशियम, कैल्शियम, खनिज लवण, एंजाइम, हार्मोन और विटामिन प्रचुर मात्रा में होते हैं।
वर्मीवाश बाजार में ₹30–40 प्रति लीटर और वर्मीकम्पोस्ट ₹10–15 प्रति किलोग्राम में उपलब्ध है। यह बेरोजगारों के लिए स्वरोजगार का अवसर भी प्रदान करता है। इस नवाचार को प्राणि विज्ञान विभाग के प्रो. केशव सिंह और निशात फ़ातिमा ने पेटेंट से उत्पाद तक विकसित किया।
IPR में प्रगति
विश्वविद्यालय ने पिछले दो वर्षों में 79 पेटेंट आवेदन, 65 कॉपीराइट और 1 ट्रेडमार्क आवेदन किए। कुलपति ने कहा कि मजबूत IPR प्रणाली नवाचार की गुणवत्ता और प्रभाव बढ़ाती है।
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