मेरी रचना, मेरी कविता
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आज ज़माना क्या फिर आयेगा,
राधा कृष्ण का त्याग बतलायेगा,
निष्काम प्रेम की वो आधारशिला,
जो नि:स्वार्थ जीवनपर्यंत निभायेगा।
मित्रता की नींव अगर भावनाओं से,
जुड़ी है तो इसका टूटना मुश्किल है,
और अगर यह स्वार्थ से जुड़ी हुई है,
तो इसका टिकना बहुत मुश्किल है।
हर सुबह हर शाम हर किसी
के लिए सुहानी नहीं होती है,
हर दोस्ती हर प्यार के पीछे
कोई कहानी भी नहीं होती है।
परंतु कुछ तो असर होता है,
प्रेमी आत्माओं के मिलन का,
जैसे गोरी गोरी राधिका का,
कृष्ण साँवरे की दीवानगी का।
हर सुबह हर शाम गुनगुनाया करो,
राधा कृष्ण के प्रेम गीत गाया करो,
सुबह और शाम भी सुहानी होगी,
प्रेम हेतु क़िस्मत आजमानी होगी।
उनका जैसा प्रेम कोई कर पायेगा,
बर्साने या द्वारिका में वे रह पायेंगे,
आदित्य द्वापर नहीं यह कलियुग है,
सतयुग, त्रेता, द्वापर लौट न आययेंगे।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र, आदित्य
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