चर्म औ अस्थि की देह को ही बनाया है घर।
तो अपनी आत्मा को इसका मेहमान मानिए।।
छल प्रपंचों में ही नित लगे हो सदा।
फिर भी मां औ पिता को वरदान मानिए।।
चंद सिक्कों के खातिर भटकते रहे।
ज्ञान को ही अपना सम्मान मानिए।।
वक्त कितना है यह तुमको भी पता खूब है।
श्वांस जितनी है ईश्वर का गुणगान मानिए।।
भोगिए भोग्य जितना है आपके भाग्य में।
दुःख भरी जिंदगी को मुस्कान मानिए।।
प्राप्ति का लक्ष्य आराध्य को है समर्पित।
मिल रही असफलता को व्यवधान मानिए।।
देश को अपने दे सके हो जो भी अब तलक।
बस उसे ही अपना खुद का अभिमान मानिए।।
देवार्चन रत सदा उनके सानिध्य में सर्वकृत।
जो मिला है उसे परमेश्वर का वरदान मानिए।।
छद्म व्यवहारयुक्त, स्वार्थी जो कुटिल नीच हैं।
उनकी बोली, भाषा औ गाली को ही ज्ञान मानिए।।
कलुषित, कुत्सित, कलंकित, व्यभिचारी जो है।
कर तिरस्कृत अपनी दृढ़ता को पहचान मानिए।
डॉक्टर प्रमोद कुमार त्रिपाठी
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