न्यूयार्क (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 19 सितंबर, 2025 को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है, जिसके तहत H-1B वीज़ा पर प्रत्येक आवेदक से वार्षिक $100,000 (लगभग ₹88 लाख) शुल्क लिया जाएगा। यह कदम अमेरिकी श्रमिकों की सुरक्षा और विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से उठाया गया है। इस निर्णय का भारतीय पेशेवरों, विशेषकर आईटी क्षेत्र में कार्यरत लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि अधिकांश भारतीय नागरिक H-1B वीज़ा के माध्यम से अमेरिका में रोजगार प्राप्त करते हैं।
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H-1B वीज़ा शुल्क में वृद्धि: अब प्रत्येक H-1B वीज़ा आवेदन पर वार्षिक $100,000 शुल्क लिया जाएगा, जो पिछले शुल्कों से कई गुना अधिक है। यह शुल्क अगले छह वर्षों तक लागू रहेगा। इससे कंपनियों के लिए H-1B वीज़ा का उपयोग महंगा हो जाएगा।
नए निवेशक वीज़ा कार्यक्रम: राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘Trump Gold Card’ और ‘Trump Platinum Card’ नामक दो नए निवेशक वीज़ा कार्यक्रमों की घोषणा की है। Gold Card के लिए $1 मिलियन और Platinum Card के लिए $5 मिलियन निवेश आवश्यक होगा। ये कार्यक्रम उच्च-आय वाले विदेशी नागरिकों को आकर्षित करने के उद्देश्य से हैं।
प्रभावित क्षेत्रों में चिंताएँ: टेक्नोलॉजी कंपनियाँ, विशेषकर अमेज़न, गूगल, और माइक्रोसॉफ्ट, जो H-1B वीज़ा पर निर्भर हैं, इस निर्णय से चिंतित हैं। उन्हें डर है कि इससे उनके संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और वे अन्य देशों में स्थानांतरित हो सकते हैं।
कानूनी चुनौतियाँ: विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति का यह आदेश कानूनी चुनौतियों का सामना कर सकता है, क्योंकि इस प्रकार के शुल्क लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस को है। इसलिए, यह आदेश अदालत में चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति का यह निर्णय भारतीय पेशेवरों और आईटी कंपनियों के लिए एक बड़ा झटका है। यदि यह आदेश लागू होता है, तो यह H-1B वीज़ा प्रणाली को महंगा और कम सुलभ बना सकता है। हालांकि, इसके कानूनी पहलुओं पर बहस जारी है, और भविष्य में इसके परिणामस्वरूप अमेरिकी श्रम बाजार और वैश्विक व्यापार पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
