ज्ञान के बल पर चला यह संसार है, इस मिट्टी पर सबसे पहले शिक्षक का अधिकार है- हरिवंश डांगे

डॉक्टर राधाकृष्णन जी का जन्म 5 सितंबर 1888 को मद्रास से 64 किलोमीटर दूर तिरूतन्नी ग्राम में हुआ था। डॉ राधाकृष्णन प्रथम उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे। देश दुनिया में वह जाने माने शिक्षक, दार्शनिक एवं विद्वान कहलाए। शिक्षा के क्षेत्र में उनका प्रथम स्थान रहा। 1954 में उन्हें भारत रत्न सम्मान से नवाजा गया। एक शिक्षक को शिक्षक के रूप में व्यक्तित्व अपने आप नहीं मिलता है, अपितु यह उनके सतत चिंतन, मनन एवं विचारों की ऊर्जा ने उसे विराट व्यक्तित्व का स्वरूप दिया है। उनकी वाणी में मेघों की गंभीरता, हृदय में सागर सा विश्वास, विचारों में हिमालय की दृढ़ता, गति में तूफानों की गति प्रलक्षित होती है। यही शिक्षक का विराट व्यक्तित्व है। शिक्षक ही विद्यार्थियों को नई ऊंचाईयों एवं नए लक्ष्य के लिए प्रेरित करता है। इसीलिए कहा है,

“गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः”
आज के कंप्यूटर, मोबाइल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में अक्सर यह प्रश्न उठाया जाता है कि क्या अब शिक्षक की आवश्यकता रह गई है? क्या विद्यार्थी केवल तकनीक के सहारे प्रगति पथ पर आगे बढ़ सकते हैं? कई अभिभावक गर्व से कहते हैं कि आज के बच्चे बहुत स्मार्ट हो गए हैं, क्योंकि उन्हें सबकुछ मोबाइल और कंप्यूटर से तुरंत मिल जाता है।
लेकिन यह सोच पूरी तरह सही नहीं है। तकनीक चाहे कितनी भी आगे बढ़ जाए, वह कभी भी शिक्षक का स्थान नहीं ले सकती।
कंप्यूटर ज्ञान का भंडार तो है, पर वह केवल सूचना दे सकता है, प्रेरणा नहीं। मोबाइल पर तैयार उत्तर तो मिल सकते हैं, पर जीवन की असफलताओं से लड़ने का साहस केवल शिक्षक ही सिखा सकते हैं। आज बच्चे हाथ से लिखने को बोरियत मानते हैं और छोटी-छोटी गणनाओं के लिए भी कैलकुलेटर का सहारा लेते हैं। वे मशीन पर अधिक भरोसा करने लगे हैं, जो उनके लिए उचित नहीं है।क्योंकि मनुष्य मस्तिष्क अब जड़ होता जा रहा है।
शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाते, बल्कि विद्यार्थियों के चरित्र, व्यक्तित्व और संस्कारों का निर्माण करते हैं। कभी प्यार से सिर पर हाथ रखकर, तो कभी हल्के से डाँट-फटकार कर, शिक्षक विद्यार्थियों को सही दिशा दिखाते हैं। वे ही सिखाते हैं कि संकट के समय धैर्य कैसे रखें, असफलता से कैसे न घबराएँ और निरंतर प्रयास करते हुए सफलता की ओर कैसे बढ़ें।
विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ जीवन जीने की कला चाहिए। पालकों को अपने बच्चों की सही परवरिश के लिए मार्गदर्शन चाहिए। और समाज को ऐसे नागरिक चाहिए जो केवल बुद्धिमान ही नहीं बल्कि संस्कारी भी हों। यह सब केवल शिक्षक ही दे सकते हैं।
इसलिए तकनीक चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, शिक्षक की भूमिका आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, बल्कि पहले से कहीं अधिक हो गई है। यही कारण है कि शिक्षक हमारे लिए सदैव सम्माननीय रहेंगे।
सच्चाई तो ये है कि जीवन में शिक्षक का स्थान माता-पिता से कम नहीं है। शिक्षक और अभिभावक बच्चों के जीवन के दो पहिए होते हैं उनके बराबर होना तथा गति से चलना जरूरी है।
अज्ञान को दूर हटाकर जिसने ज्ञान की ज्योत जलाई।
जीवन में संस्कार दिए, जीने की रीत सिखाई।
ज्ञान मिला, दिशा मिली जग में कर पाया नाम।
ऋणी रहेगा जगत शिक्षक तुम्हें प्रणाम।

यदि देश को सोने की चिड़िया बनाना है, तो सरकार को शिक्षकों की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षक के वेतन, भत्ते पेंशन इत्यादि के लिए अलग से राशि का प्रावधान किए जाने की जरूरत है। शिक्षकों का ग्रीष्म अवकाश परिवार की जिम्मेदारियां के लिए केंद्रित होना चाहिए। उन्हें जनसंख्या, इलेक्शन, प्रशिक्षण एवं अन्य कार्यों में शिक्षक को मुक्त किया जाना चाहिए। शिक्षकों को मशीन नहीं मानव ही रहने दिया जाए। माता-पिता को महापुरुषों के उदाहरण जैसे विवेकानंद, महात्मा गांधी, नेपोलियन बोनापार्ट, अब्राहम लिंकन जो कहते थे कि मेरे शब्द कोष में असंभव नाम का शब्द नहीं है, इस तरह के उदाहरण देना चाहिए। आज बच्चे भारतीय संस्कृति एवं नैतिकता से कटते जा रहे है, प्रतिभाएं विदेश में लगी हुई है। सरकार को भी इस तरफ ध्यान देना चाहिए। आगे कहा भी है,

मुमकिन नहीं खुश्क मिले हर ज़मीन, प्यासे चल पड़े हैं, तो दरिया जरूर मिलेगा।

हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था एक चुनौती है। परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर सफलता का आकलन, शिक्षकों पर सदा से दबाव बना रहता है कि बच्चों का रिजल्ट अच्छा होना चाहिए। क्षमताओं का विकास अच्छे भविष्य की गारंटी है, ना की अंकसूची। इस कारण विद्यार्थी घबराहट एवं अवसाद में ट्यूशन के चक्कर में भटकते देखे गए हैं। क्षमताओं के विकास के बिना अंको का कोई महत्व नहीं है। भारत की युवा आबादी असीम संभावनाओं से भरी हुई है। बस उन्हें उचित शिक्षा अवसर मुहैया कराने की दरकार है। शिक्षकों को चाहिए की अपना शिक्षण कार्य ईमानदारी,लगन, निष्पक्षता एवं पूजा समझ कर करना चाहिए, क्योंकि शिक्षण कार्य आत्मा अभिव्यक्ति की साधना है । शिक्षा मनुष्य रचने की पाठशाला है। मैं कहना चाहूंगी की यदि विद्यार्थी को शिक्षक का स्नेह, ज्ञान एवं,विद्या पाना है तो उसे नम्र, जिज्ञासु, परिश्रमी, सेवाभावी, देशप्रेमी एवं श्रद्धाभावी होना चाहिए।

शिक्षावान लभते ज्ञानं।

शिक्षक को उदार, चेतना, प्रतिभा संपन्न अपने विषय का ज्ञाता, भेदभाव से मुक्त, वैज्ञानिक दृष्टिकोण संपन्न और शिष्य की समस्याओं का समाधान करता दूरदर्शी होना चाहिए। शिक्षक विद्यार्थी की ज़मीन है। शिक्षक, विद्यार्थी को आसमान तक पहुंचाने का हुनर रखता है। शिक्षक, फिलोस्फर है, गाइड है। शिक्षक देश का स्तंभ है। 15 अगस्त 2003 में राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने देश के 57वें स्वतंत्रता दिवस पर कहा था, “यदि राष्ट्र को भ्रष्टाचार मुक्त, संस्कारिता युक्त, भ्रष्टाचार मुक्त एवं सुंदर बनाना है ,तो शिक्षक, छात्र एवं सरकार उसमें परिवर्तन ला सकते है।”

हर दिन नई टेक्नोलॉजी आ रही है, उसका सीखना समझना और विद्यार्थी को समझाने की चुनौती शिक्षक की रहती है। शिक्षक छात्रों को सिर्फ परीक्षा में पास होने के काबिल ही नहीं बनाते बल्कि जिंदगी में हर कदम पर आने वाले इम्तिहान का सामना करने के लिए तैयार भी करते हैं। शिक्षा की ज़मीन पर शिक्षक के पसीने से ही हर छात्र का भविष्य फलदार बनता है। इसलिए मैं कहना चाहूंगी, शिक्षक का स्थान कल भी प्रथम था, आज भी प्रथम है और भविष्य में भी प्रथम एवं वंदनीय रहेगा।

शिक्षक ज्ञान का भंडार है। विद्यार्थी के भविष्य का आधार है।
जीवन यहां से शुरू होता है, राह दिखाने वाला गुरु होता है।

rkpnews@somnath

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