Tuesday, January 20, 2026
HomeUncategorizedवर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और वैश्विक भरोसे की पुनर्स्थापना

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और वैश्विक भरोसे की पुनर्स्थापना

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम दावोस 2026: संवाद की भावना और वैश्विक अनिश्चितताओं के युग में सहयोग की नई रूपरेखा

गोंदिया – वैश्विक मंच पर स्विट्ज़रलैंड के दावोस में 19 से 23 जनवरी 2026 तक आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की 56वीं वार्षिक बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था गहरे संक्रमण काल से गुजर रही है। यह आयोजन केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं, बल्कि वह वैश्विक मंच है जहाँ दुनिया की आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी दिशा को प्रभावित करने वाले विमर्श और निर्णय आकार लेते हैं। इस वर्ष की थीम “ए स्पिरिट ऑफ डायलॉग (संवाद की भावना)” इस बात का स्पष्ट संकेत है कि दुनिया टकराव, ध्रुवीकरण और अविश्वास से निकलकर संवाद, सहयोग और सहमति की नई राह तलाश रही है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में स्थित है और इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य यही रहा है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल सरकारों या बाज़ार के बल पर नहीं, बल्कि बहु-हितधारक सहयोग और सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। यही कारण है कि डब्ल्यूईएफ दुनिया के शीर्ष राजनीतिक नेताओं, वैश्विक कॉरपोरेट जगत, शिक्षाविदों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, नागरिक समाज और उभरते युवा नेतृत्व को एक मंच पर लाकर वैश्विक, क्षेत्रीय और औद्योगिक नीतियों को आकार देने का प्रयास करता है।

ये भी पढ़ें – कागजों में साफ-सफाई, हकीकत में गंदगी: ग्राम पंचायत व्यवस्था पर सवाल

दावोस 2026: भागीदारी का अभूतपूर्व विस्तार
दावोस 2026 अपने पैमाने और प्रतिनिधित्व के लिहाज़ से ऐतिहासिक माना जा रहा है। इस वर्ष 130 से अधिक देशों से लगभग 3,000 नेता इसमें भाग ले रहे हैं। इनमें करीब 400 राजनीतिक नेता, लगभग 65 राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख तथा जी-7 के छह नेता शामिल हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि दावोस अब केवल आर्थिक विमर्श का मंच नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, कूटनीति और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी प्रभावी संवाद का केंद्र बन चुका है।
राजनीतिक नेतृत्व के साथ-साथ लगभग 850 शीर्ष वैश्विक सीईओ और कॉरपोरेट अध्यक्ष भी इस मंच पर मौजूद हैं। इसके अलावा, लगभग 100 यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स और अत्याधुनिक तकनीकी कंपनियों के प्रतिनिधि भी दावोस 2026 में भाग ले रहे हैं। यह उपस्थिति स्पष्ट करती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का भविष्य अब केवल पारंपरिक उद्योगों तक सीमित नहीं, बल्कि नवाचार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और उभरती प्रौद्योगिकियों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

ये भी पढ़ें – अवैध गेमिंग पर सख्ती, महराजगंज पुलिस की जीरो टॉलरेंस नीति

संवाद का मंच: भरोसे की बहाली की कोशिश
डब्ल्यूईएफ स्वयं को संवाद, सहयोग और कार्रवाई के लिए एक निष्पक्ष वैश्विक मंच के रूप में प्रस्तुत करता है। आज जब दुनिया भू-राजनीतिक तनाव, युद्धों, व्यापारिक टकरावों और सामाजिक विभाजन से जूझ रही है, ऐसे समय में यह मंच और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। फोरम का दावा है कि विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं के बीच सार्थक संवाद को बढ़ावा देकर वह वैश्विक स्तर पर भरोसे की बहाली का कार्य करता है।
दावोस केवल विचार-विमर्श का मंच नहीं, बल्कि यह देशों के लिए अपनी आर्थिक और निवेश क्षमता को वैश्विक समुदाय के सामने प्रस्तुत करने का अवसर भी देता है। उदाहरण के तौर पर, भारत दावोस 2026 में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है। भारत न केवल अपने राष्ट्रीय विकास एजेंडे को प्रस्तुत कर रहा है, बल्कि गिफ्ट सिटी जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र और कर्नाटक, तेलंगाना जैसे राज्यों की निवेश संभावनाओं को भी वैश्विक निवेशकों के समक्ष रख रहा है।

ये भी पढ़ें – नए ग्रामीण रोजगार कानून के खिलाफ कांग्रेस की महापंचायत रणनीति

संवाद की भावना: 2026 की थीम का गहन अर्थ
दावोस 2026 की थीम “संवाद की भावना” वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों का सटीक प्रतिबिंब है। यह इस बात पर केंद्रित है कि भू-राजनीतिक जोखिम, आर्थिक अनिश्चितता और वैश्विक एकीकरण को लेकर बदलती धारणाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग को किस प्रकार नए सिरे से परिभाषित किया जाए। आज एक ओर वैश्वीकरण के लाभों पर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी ओर राष्ट्रवाद और संरक्षणवाद का उभार दिख रहा है। ऐसे में संवाद केवल कूटनीतिक शब्द नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता और शांति की अनिवार्य शर्त बन जाता है।
इस वर्ष की बैठक में जलवायु परिवर्तन, आर्थिक असमानता, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला संकट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी परिवर्तनकारी तकनीकों के जिम्मेदार उपयोग पर विशेष जोर दिया जा रहा है। चर्चाओं का उद्देश्य केवल समस्याओं की पहचान नहीं, बल्कि व्यावहारिक और क्रियान्वयन योग्य समाधानों की तलाश है।
भारत की भूमिका: उभरती वैश्विक शक्ति का प्रदर्शन
दावोस 2026 में भारत की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत आज न केवल दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, बल्कि वह ग्लोबल साउथ की सशक्त आवाज़ के रूप में भी उभर रहा है। रेलवे, आईटी, कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रामीण विकास और नागरिक उड्डयन जैसे क्षेत्रों में भारत की सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि वह दावोस को केवल निवेश मंच नहीं, बल्कि वैश्विक नीति संवाद और साझेदारी के अवसर के रूप में देखता है।

ये भी पढ़ें – गोविंदा ने तोड़ी चुप्पी: सुनीता आहूजा के आरोपों को बताया ‘बड़ी साजिश’, जानिए पूरा विवाद

समग्र विश्लेषण से स्पष्ट है कि दावोस 2026 ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया बहु-आयामी संकटों से घिरी है। आर्थिक अनिश्चितता, जलवायु संकट, तकनीकी असंतुलन और भू-राजनीतिक तनाव किसी एक देश के प्रयासों से हल नहीं हो सकते। ऐसे में “संवाद की भावना” केवल एक थीम नहीं, बल्कि वैश्विक आवश्यकता बन जाती है। यदि दावोस 2026 की चर्चाएँ ठोस नीतिगत बदलावों और वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सहयोग में बदलती हैं, तो यह बैठक वैश्विक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में याद की जाएगी।

संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments