(मऊ से ✍️ धीरेन्द्र कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट )
मऊ (राष्ट्र की परम्परा) सरकार द्वारा खुले में शौच से मुक्ति (ODF) की दिशा में करोड़ों की योजनाएं लागू करने और जागरूकता फैलाने के तमाम प्रयासों के बावजूद कोपागंज ब्लॉक के ग्रामीण क्षेत्रों में हालात आज भी चिंताजनक हैं। सभी ग्राम पंचायतों को ओडीएफ घोषित किए जाने के बावजूद सच्चाई यह है कि न पगडंडी छूटी है और न ही हाथों से लोटा।

ग्राम्य जीवन की यह विडंबना है कि सरकारी प्रयास, योजनाएं और प्रोत्साहन राशि – सब कुछ होने के बावजूद भी गांवों में शौचालयों का उपयोग नहीं हो पा रहा है। बात अगर समग्र लोहिया ग्रामों की करें, जिन्हें विकास के लिए विशेष प्राथमिकता दी गई थी, तो स्थिति और भी शर्मनाक नजर आती है। पांच वर्ष पहले बने शौचालय अब तक उपयोग में नहीं लाए जा सके। कहीं निर्माण अधूरा है तो कहीं शौचालयों पर सिर्फ रंग-रोगन कर भुगतान करवा लिया गया है।

शर्मिंदगी की स्थिति, दिखावे के दावे

कोपागंज ब्लॉक के गांवों में लोगों के दरवाजे पर पर्दा है, चेहरे पर पर्दा है, मगर शौच के लिए बेपर्दा होना आज भी मजबूरी है। सरकार बार-बार जागरूकता अभियान चला रही है, सचिवों और ग्राम प्रधानों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सुबह 5 बजे ग्रामीणों को रोकने व समझाने गांवों की गलियों और पगडंडियों पर निकलें। इसके लिए अलग-अलग विभागों के अधिकारियों को गांवों का नोडल बनाया गया है, पर इसका असर ज़मीनी स्तर पर शून्य नजर आ रहा है।

प्रोत्साहन राशि भी बनी मज़ाक

सरकार द्वारा प्रति शौचालय 12,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि देने के बावजूद कई ग्रामीणों ने अब तक शौचालय नहीं बनवाया है। सबसे अधिक परेशानी समाज के कमजोर तबके के लोगों को है, जिन्हें न तो योजना की पूरी जानकारी है और न ही सहयोग। ग्राम प्रधानों और सचिवों की निष्क्रियता भी इस स्थिति को बढ़ा रही है।

लोहिया ग्रामों की जमीनी हकीकत

कोपागंज ब्लॉक के दर्जनों गांवों को समग्र लोहिया ग्राम घोषित कर करोड़ों रुपये की योजनाएं चलाई गईं। उच्च अधिकारियों ने निरीक्षण किया, चौपालें लगाईं, रिपोर्टें बनीं और संतोषजनक बताते हुए कागज़ों में योजनाएं पूरी घोषित कर दी गईं। लेकिन हकीकत में इन गांवों की स्थिति आज भी वैसी ही है – शौचालय अधूरे, अनुपयोगी और उपेक्षित।

शौचालयों की जांच में हो सकते हैं चौंकाने वाले खुलासे
स्थानीय ग्रामीणों – प्रवीण चौरसिया, राजीव पांडेय आदि – का कहना है कि अगर कोपागंज की ओडीएफ घोषित ग्राम पंचायतों में बने शौचालयों की ईमानदारी से जांच कराई जाए, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आएंगे। उन्होंने जिलाधिकारी से अनुरोध किया है कि किसी निष्पक्ष वरिष्ठ अधिकारी से जांच कराई जाए। उनका दावा है कि अनेक गांवों में पुराने शौचालयों पर रंग-रोगन कर प्रधान व सचिवों की मिलीभगत से भुगतान करा लिया गया है।