वंदे मातरम की भावना बनाम बुलडोजर राजनीति: सपा सांसद का बड़ा आरोप

नई दिल्ली(राष्ट्र की परम्परा डेस्क)वंदे मातरम विवाद एक बार फिर राजनीति के केंद्र में है। समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद अवधेश प्रसाद ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि उनके काम और भाषण राष्ट्रीय गीत की भावना के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए दुनिया में अलग पहचान रखता है, लेकिन मौजूदा सरकार उस विरासत को कमजोर कर रही है।

अवधेश प्रसाद ने कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की एकता, भाईचारे और समन्वय का प्रतीक है। इसका संदेश विविधता में एकता को मजबूती देना है, लेकिन आज प्रदेश में सरकार जिस प्रकार का माहौल बना रही है, वह इस मूल भावना के विपरीत है। उन्होंने कहा कि देश के राष्ट्रीय गीत की असली प्रेरणा यह है कि हम सब मिलकर समाज में शांति, सद्भाव, रोजगार और समानता के रास्ते को मजबूत करें।

‘बटोगे तो काटोगे’ और बुलडोजर नीति पर सपा सांसद का वार

सपा सांसद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कई विवादित टिप्पणियों और उनकी बुलडोजर नीति पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री कभी कहते हैं, ‘बटोगे तो काटोगे’, तो कभी बुलडोजर की बात करते हैं। यह भाषा और यह रवैया वंदे मातरम के संदेश से मेल नहीं खाता, जो देशवासियों को एकजुट करने और भाईचारा बढ़ाने की बात करता है।

प्रसाद ने कहा, “राष्ट्रीय गीत बेरोज़गारी समाप्त करने, समाज में सहयोग बढ़ाने, लोगों को जोड़ने और राष्ट्र को मजबूत करने का संदेश देता है। यह गांधी, लोहिया और जयप्रकाश के विचारों वाला देश बनाने का आह्वान करता है, न कि डर और दमन का वातावरण तैयार करने का।”

संसद में ‘वंदे मातरम’ पर 12 घंटे की ऐतिहासिक चर्चा

उधर, संसद में भी वंदे मातरम विवाद पर खास फोकस रहा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में राष्ट्रीय गीत पर विशेष चर्चा की शुरुआत की। यह चर्चा वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित की जा रही है, जिसमें बड़ी संख्या में सदस्यों ने अपनी राय रखी। बहस लगभग 12 घंटे आधी रात तक चली, जो इस विषय की संवेदनशीलता और महत्व को दर्शाती है।

वंदे मातरम का इतिहास: 150 साल का गौरव

वंदे मातरम का यह वर्ष विशेष है। भारत का राष्ट्रीय गीत 7 नवंबर 1875 को पहली बार बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा बंगदर्शन पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। बाद में इसे 1882 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। इस गीत को रवींद्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध किया। आज यह गीत भारत की सांस्कृतिक, राजनीतिक और सभ्यतागत पहचान का अटूट हिस्सा है।

संसद का शीतकालीन सत्र 1 दिसंबर से शुरू हो चुका है और 19 दिसंबर तक जारी रहेगा। सत्र के शुरुआती दिनों में ही वंदे मातरम विवाद राजनीतिक बहस का मुख्य विषय बन गया है।

Editor CP pandey

Recent Posts

सतत कृषि ही भविष्य की समृद्धि का आधार: भुवनेश्वर नाथ पांडेय

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय के कृषि संकाय में शुक्रवार को "सतत कृषि…

12 hours ago

शिक्षक हितों के लिए संघर्षशील नेतृत्व चुनने का समय: डॉ. शरदेन्दु त्रिपाठी

शिक्षक एमएलसी चुनाव: बदलाव की मांग तेज संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। गोरखपुर-अयोध्या शिक्षक…

12 hours ago

गरीबों को आवास दिलाने दिव्यांगों को प्राथमिकता देने व धनराशि बढ़ाने की मांग

भागलपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)l ग्रामीण क्षेत्रों में आवास निर्माण को लेकर व्याप्त समस्याओं और खामियों को…

12 hours ago

सोनार समाज की बैठक में बड़ा फैसला, राजू, आलोक और ओमप्रकाश बने नगर अध्यक्ष

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। जिला सोनार समाज की आवश्यक बैठक पेड़ा गली, मालवीय रोड स्थित…

22 hours ago

जनसेवा से बनाई अलग पहचान, रसड़ा विधायक उमाशंकर सिंह के निधन से शोक की लहर

बसपा के कद्दावर नेता और रसड़ा विधायक उमाशंकर सिंह का निधन, पूर्वांचल की राजनीति में…

2 days ago

आईटीआई प्रवेश के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 7 अगस्त तक बढ़ी

संतकबीरनगर (राष्ट्र की परम्परा)। राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) मेहदावल के प्रधानाचार्य उदय नारायण ने…

3 days ago