भारतीय संस्कृति और जनभाषा की आत्मा: पाणिनी के सूत्रों में छिपा भारत

कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। यदि भारतीय संस्कृति की आत्मा को समझना हो, उसकी वैचारिक जड़ों तक पहुँचना हो और आमजन की बोलचाल की भाषा में छिपे संस्कारों को पहचानना हो, तो आधुनिक भाषाविज्ञान से अधिक आचार्य पाणिनी के सूत्रों की शरण लेनी होगी। पाणिनी केवल संस्कृत के महान व्याकरणाचार्य नहीं थे, बल्कि वे भारतीय सभ्यता के मौन इतिहासकार थे, जिन्होंने भाषा के माध्यम से समाज, संस्कृति और चेतना को सूत्रबद्ध किया।

आज की हिंदी, अवधी, भोजपुरी, ब्रज, मगही, मराठी, गुजराती और यहां तक कि आधुनिक बोलचाल के शब्द भी कहीं न कहीं पाणिनीय परंपरा की छाया में विकसित हुए हैं। पाणिनी की अष्टाध्यायी केवल व्याकरण के नियमों का ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की सोचने, बोलने और समझने की पद्धति का दर्पण है। पाणिनी की भाषा केवल भाषा नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है।

भाषा को समाज से जोड़ने वाले आचार्य पाणिनी

पाणिनी ने भाषा को किसी मंदिर की स्थिर मूर्ति नहीं बनाया, बल्कि उसे जीवंत समाज से जोड़ा। उनके सूत्र बताते हैं कि भाषा कैसे बदलती है, कैसे सरल होती है और कैसे जनसामान्य के अनुकूल ढलती है। यही कारण है कि भारतीय भाषाओं में शुद्धता के साथ-साथ स्वाभाविकता भी दिखाई देती है।

जब गांव का किसान सहजता से कहता है— “काम हो गया”— या मां बच्चे को पुकारती है— “इधर आ जा”— तो वहां व्याकरण का बोझ नहीं, बल्कि संस्कृति की सहज आत्मा बोलती है। यह सहजता पाणिनीय दृष्टि की ही देन है।

सूत्रों में बंधा लोकतंत्र

पाणिनी के सूत्र आकार में छोटे, लेकिन अर्थ में विराट हैं। वे यह सिखाते हैं कि भाषा किसी एक वर्ग की बपौती नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा धरोहर है। यही कारण है कि भारतीय भाषाएं अभिजात्य और जनसामान्य के बीच पुल बनती हैं, दीवार नहीं।

आज जब भाषा को लेकर विवाद और संकीर्णता बढ़ रही है, तब पाणिनी यह याद दिलाते हैं कि भाषा जोड़ने का माध्यम है, तोड़ने का नहीं।

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आधुनिक भारत और पाणिनी

कंप्यूटर साइंस से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तक, आज पूरी दुनिया पाणिनी के सूत्रों की तार्किक और संरचनात्मक शक्ति को स्वीकार कर रही है। यह केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परंपरा की वैश्विक स्वीकृति है। विडंबना यह है कि जिस पाणिनी को पश्चिम गंभीरता से पढ़ रहा है, हम उन्हें केवल पाठ्यक्रम तक सीमित कर चुके हैं।

भारतीय संस्कृति को समझने के लिए केवल इतिहास पढ़ना पर्याप्त नहीं, भाषा को जीना पड़ता है। और भाषा को समझने की सबसे सशक्त चाबी पाणिनी के सूत्रों में छिपी है। आज के शोर, जल्दबाजी और सतही संवाद के दौर में पाणिनी हमें सिखाते हैं—
कम शब्दों में अधिक अर्थ, और भाषा में संस्कृति।

यदि भारत को समझना है, तो पाणिनी को केवल पढ़ना नहीं, समझना होगा— क्योंकि पाणिनी के सूत्रों में ही भारत बोलता है।

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Karan Pandey

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