अखंड ज्योति: अंधकार के युग में मानव चेतना को प्रकाशित करने वाली शाश्वत लौ
कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।आज का समय बाहरी चकाचौंध और तकनीकी प्रगति से भरा हुआ है, लेकिन इसके समानांतर मानव मन के भीतर का अंधकार भी गहराता जा रहा है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर संवेदनाएँ सिमटती जा रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में अखंड ज्योति केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मानव चेतना को जाग्रत करने वाली वह शाश्वत लौ है, जो हर काल में समाज को दिशा देती रही है।
अखंड ज्योति का वास्तविक अर्थ केवल दीपक की निरंतर जलती लौ तक सीमित नहीं है। यह जीवन में निरंतर सत्य, संयम, करुणा और आत्मबोध को जीवित रखने का प्रतीक है। जब मनुष्य स्वार्थ, हिंसा, लालच और वैमनस्य के अंधकार में घिर जाता है, तब अखंड ज्योति उसे यह स्मरण कराती है कि सच्चा प्रकाश बाहरी नहीं, बल्कि भीतर से उत्पन्न होता है।
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मानव इतिहास इस तथ्य का साक्षी रहा है कि जब-जब समाज अज्ञान और अधर्म की ओर बढ़ा, तब-तब अखंड ज्योति किसी न किसी रूप में प्रज्वलित हुई। कभी ऋषि-मुनियों की तपस्या में, कभी संतों के वचनों में, तो कभी समाज सुधारकों के विचारों और आंदोलनों में यह ज्योति मानवता का मार्गदर्शन करती रही। यही ज्योति बताती है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप कर्मकांड नहीं, बल्कि सेवा, सद्भाव और सत्यनिष्ठ आचरण है।
आज की युवा पीढ़ी मानसिक तनाव, दिशाहीनता और नैतिक भ्रम से जूझ रही है। सोशल मीडिया और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में आत्मिक संतुलन तेजी से खो रहा है। ऐसे समय में अखंड ज्योति का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह युवाओं को आत्मनिरीक्षण, संयम और उद्देश्यपूर्ण जीवन की ओर प्रेरित करती है। अखंड ज्योति सिखाती है कि सफलता केवल धन या पद नहीं, बल्कि एक सजग, संवेदनशील और जिम्मेदार मनुष्य बनना है।
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समाज के स्तर पर भी अखंड ज्योति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। बढ़ती असहिष्णुता, सामाजिक विभाजन और मानवीय मूल्यों के क्षरण के बीच यह शाश्वत लौ समाज को जोड़ने का कार्य करती है। यह याद दिलाती है कि जब प्रकाश साझा किया जाता है, तो वह कम नहीं होता, बल्कि और अधिक उज्ज्वल बनता है। एक व्यक्ति की सकारात्मक चेतना पूरे समाज में परिवर्तन की लहर उत्पन्न कर सकती है।
अखंड ज्योति एक साथ चेतावनी भी है और आशा भी। चेतावनी इस बात की कि यदि आत्मिक प्रकाश बुझ गया, तो समाज दिशाहीन हो जाएगा। और आशा इस विश्वास की कि जब तक एक भी ज्योति जलती रहेगी, तब तक अंधकार की पराजय निश्चित है। यही विश्वास मानव सभ्यता को संकट के समय में भी आगे बढ़ने की शक्ति देता है।
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आज आवश्यकता है कि हम अखंड ज्योति को केवल मंदिरों, अनुष्ठानों या प्रतीकों तक सीमित न रखें। इसे अपने विचारों, व्यवहार, सामाजिक दायित्वों और दैनिक जीवन में उतारें। जब हमारे शब्द सत्य से, कर्म करुणा से और निर्णय विवेक से संचालित होंगे, तभी यह ज्योति वास्तव में अखंड रहेगी।
अंततः अखंड ज्योति मानव चेतना का वह प्रकाश है, जो अंधकार को कोसने के बजाय स्वयं प्रकाश बनकर मार्ग दिखाता है। यही शाश्वत लौ भविष्य की दिशा तय करती है और मानवता को उसके मूल उद्देश्य की याद दिलाती है।
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