चेहरा देखकर रंग बदलता है क्या देश में कानून ऐसे चलता है?

भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में कानून की सर्वोच्चता और समानता का सिद्धांत संविधान की आत्मा है। अनुच्छेद 14 स्पष्ट रूप से कहता है कि राज्य किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से वंचित नहीं करेगा और सभी को विधि की समान संरक्षण का अधिकार होगा। फिर भी, व्यावहारिक जीवन में अक्सर देखने को मिलता है कि कानून का रंग चेहरा देखकर बदलता प्रतीत होता है। अमीर-गरीब, प्रभावशाली-निर्बल, सत्ताधारी-विपक्षी के बीच कानून की व्याख्या और लागू करने में भेदभाव नजर आता है। यह न केवल न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि समाज में असंतोष और अविश्वास की खाई को गहरा करता है। क्या यही कानून का असली चेहरा है, जो शक्ति और पहुंच के आधार पर अपना रूप बदल लेता है?

2024 भारतीय चुनाव विवाद

भारत के इतिहास में कानून के चुनिंदा लागू होने और भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा हालिया उदाहरण 2024 भारतीय आम चुनाव विवाद है, जिसमें अनुमानित रूप से अरबों रुपये के चुनावी धन का दुरुपयोग हुआ। 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान आरोप लगे कि निर्वाचन आयोग ऑफ इंडिया (ईसीआई) और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच साठगांठ से चुनावी धांधली की गई। विपक्षी दलों ने दावा किया कि वोटर लिस्ट में हेरफेर, ईवीएम की संदिग्धता और मतगणना में अनियमितताएं हुईं, जिससे परिणाम प्रभावित हुए। सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हुईं, लेकिन अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया, जबकि छोटे स्तर की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई हुई। ईसीआई पर पक्षपातपूर्ण जांच न करने का आरोप लगा, और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया। यह विवाद न केवल 1.4 अरब मतदाताओं के विश्वास को हिला गया, बल्कि कानून के दुरुपयोग का प्रतीक बन गया, जहां प्रभावशाली पक्ष को संरक्षण मिला। 2025 तक चल रही जांचों के बावजूद, कई बड़े नामों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जो दर्शाता है कि चुनाव कानून शक्तिशाली चेहरों के लिए नरम पड़ जाते हैं।

गुजरात का मोरबी पुल और अन्य हादसे जिसमे कानून नर्म

गुजरात में कानून के चेहरा बदलने का हालिया और गंभीर उदाहरण 30 अक्टूबर 2022 का मोरबी पुल हादसा है, जिसकी जांच और कानूनी प्रक्रिया 2023-2024 तक खिंचती रही, और प्रभावशाली लोगों को संरक्षण मिलने के आरोप लगे। ब्रिटिश कालीन झूलता पुल, जिसे ओरेवा ग्रुप (अजंता क्लॉक कंपनी) ने रखरखाव के लिए लिया था, अत्यधिक भीड़ के कारण टूट गया। इस हादसे में 135 लोगों की मौत हुई, जिनमें अधिकांश बच्चे और महिलाएं थीं। शुरुआती जांच में पता चला कि पुल का नवीनीकरण घटिया सामग्री से किया गया, क्षमता से अधिक लोगों को प्रवेश दिया गया, और सुरक्षा प्रमाणपत्र बिना उचित निरीक्षण के जारी किए गए। ओरेवा ग्रुप के मालिक जयसुख पटेल सहित नौ लोग गिरफ्तार हुए, लेकिन कंपनी के शीर्ष अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। गुजरात सरकार ने विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया, लेकिन रिपोर्ट में देरी हुई और राजनीतिक दबाव के आरोप लगे, क्योंकि ओरेवा ग्रुप का सत्तारूढ़ दल से निकट संबंध माना जाता है।

2023 में गुजरात हाईकोर्ट ने सरकार की जांच पर सवाल उठाए और स्वतंत्र जांच की मांग की, लेकिन मामला लंबित रहा। पीड़ित परिवारों को मुआवजा तो मिला (प्रत्येक मृतक के लिए 2 लाख राज्य से और 10 लाख केंद्र से), किंतनीय अपराधी जिम्मेदारी तय करने में विलंब हुआ। 2024 तक चार्जशीट दायर हुई, लेकिन मुख्य आरोपी जयसुख पटेल को जमानत मिल गई, जबकि छोटे कर्मचारियों पर सख्ती बरती गई। यह प्रकरण दर्शाता है कि गुजरात में कानून राज्य की आर्थिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर अपना रंग बदल लेता है—बड़े उद्योगपतियों को संरक्षण, जबकि साधारण नागरिकों और पीड़ितों को न्याय के लिए वर्षों इंतजार। हादसे की जांच रिपोर्ट 2024 में सार्वजनिक हुई, जिसमें रखरखाव की भयानक लापरवाही उजागर हुई, लेकिन उच्च स्तर पर जवाबदेही तय नहीं हुई। मोरबी हादसा न केवल इंजीनियरिंग विफलता, बल्कि कानूनी प्रणाली की असमानता का प्रतीक बन गया, जहां प्रभावशाली चेहरों के लिए कानून नरम और सामान्य जन के लिए कठोर हो जाता है।ऐसे ही गुजरात में सता पक्ष के लिए कानून कुछ भी हद तक जा सकता हे और कितने बड़े कांड को छोटा और छोटे से छोटे कांड को बड़ा दिखाता हे। जैसे टी.आर.पी. गेम जॉन , सरकारी भर्ती में धांधली , जमीनें बेच देना लोन माफी सभी चीजे हाइलाइट नहीं होती और कानून ने अपने आंखों में पटी बांध ली हे।

कानून निष्पक्ष होना अति आवश्यक

ये उदाहरण साबित करते हैं कि कानून का रंग चेहरा देखकर बदलना कोई नई बात नहीं, लेकिन यह लोकतंत्र के लिए घातक है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता, पारदर्शी जांच और सख्त जवाबदेही ही इस विकृति को रोक सकती है। यदि कानून सभी के लिए समान नहीं चलेगा, तो देश की एकता और विश्वास खतरे में पड़ जाएगा। समय आ गया है कि हम कानून को व्यक्ति नहीं, सिद्धांत से चलाएं। केवल तभी भारत सचमुच ‘विधि का राज्य’ बनेगा। वरना धीरे धीरे लोग कानून के गैर उपयोग जान जाएंगे और उसका वजूद सिर्फ कमजोर और अज्ञानी लोगों पर ही रहेगा जैसे ज्यादातर मोटर व्हीकल एक्ट में हो रहा हे। ऐसा भी हो सकता हे की बार बार पीड़ित लोग कानून की। धज्जियां उड़ाएंगे और कानून अपने हाथ में लेने लगे तो इसका नुकसान पूरे देश को उठाना पड़े। इसलिए देश और राज्यों के कानून और न्यायलय को यह चीज ध्यान में रख सुधार लाना चाहिए।।

प्रतीक संघवी गुजरात

rkpnews@desk

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