बलिया (राष्ट्र की परम्परा)
बदलते समय के साथ लोग अपनी संस्कृति को कहीं न कहीं भूलते जा रहे हैं। दीयों के त्यौहार दीपावली पर जहां लोगों के घर रोशनी होती है, तो वही कुम्हारों के घरों में अंधेरा छाया रहता है। जहां लोग मिट्टी के दीए का इस्तेमाल करते थे। आज कहीं न कहीं मिट्टी के दीयों की जगह चाइनीज झालरों ने ले ली है। वही कुम्हारों के सामने अपनी रोजी-रोटी को चलाने की समस्या बन गई है। कुछ समय पहले कुम्हारों के यहां दीपावली आने से हफ्तों पहले ही मिट्टी के दीए बनाने के ऑर्डर मिल जाया करते थे। लेकिन चाइनीज झालरों के आने के बाद से कुम्हारों के सामने बड़ी समस्या आ गई है। वहीं देहात क्षेत्रों में भी दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीए, चाइनीज झालरों और लाइटो के भेट चढ गए हैं, बाजारों में मिट्टी के दीयों की जिस तरह से बिक्री समाप्त हो रही है। उससे कुम्हार समाज के सामने चिंता का विषय बना हुआ है। कहीं न कहीं मिट्टी के दिए अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। वहीं बाजारों में चाइनीज लाइट, चाइनीस झालर इलेक्ट्रॉनिक दिए पूरी तरह से बाजार में अपनी पैठ जमा लिए हैं। इससे निश्चित तौर पर कुम्हारों के सामने अपने जीवन यापन के लिए समस्या खड़ी हो गई है। एक जमाना था जब दीपों का त्योहार दिवाली आती थी तो कुम्हारों की दिनचर्या ही बदल जाती थी। दीपावली आने से महीनों पहले कुम्हार अपने पूरे परिवार के साथ मिल कर दीया तैयार करने में जुट जाते थे। कुम्हारों को साल भर रोशनी का पर्व दीपावली का इंतजार रहता था। लेकिन यह त्यौहार भी अब कुम्हारों के घरों में अंधेरा ही ला रहा है। आधुनिक झालरों की लोकप्रियता बाजारों में इस कदर बढ़ गई है, कि लोग मिट्टी के दीए को खरीदना ही नहीं चाहते। बताते चलें कि दीपावली की पहचान दियो से होती है लेकिन हर साल बढ़ते चाइनीज झालरों ने बाजारों में इस कदर अपनी पैठ बना ली है, की मिट्टी के दीयों का अस्तित्व ही खत्म होता जा रहा है। लोगों को ज्यादा से ज्यादा मात्रा में मिट्टी के दिए खरीदनी चाहिए जिससे वह अपने घर में रोशनी के साथ-साथ दूसरे के घरों में भी रोशनी भर दे।
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