किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया कोई सामान्य राजनीतिक कदम नहीं होती। यह तभी उचित मानी जाती है जब इसके पीछे ठोस तथ्य, गंभीर आरोप और निष्पक्ष मंशा हो। लेकिन स्वामीनाथन पर महाभियोग की मौजूदा कोशिशें इन मानकों पर खरी उतरती नहीं दिखतीं। उलटे, यह प्रयास लोकतांत्रिक संस्थाओं को डराने और असहमति की आवाज़ों को दबाने की प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है।
लोकतंत्र की आत्मा संस्थागत स्वतंत्रता में निहित होती है। यदि न्यायिक या संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति सत्ता के दबाव से मुक्त होकर निर्णय नहीं ले पाएंगे, तो नागरिकों का भरोसा कमजोर होगा। स्वामीनाथन के मामले में जिस तरह आलोचनात्मक रुख और असहज सवालों को “असुविधाजनक” बताकर महाभियोग की तलवार लटकाई जा रही है, वह एक खतरनाक मिसाल कायम करता है। आज निशाने पर एक व्यक्ति है, कल कोई भी संस्था हो सकती है।
महाभियोग प्रक्रिया का दुरुपयोग सत्ता को तात्कालिक राहत भले दे दे, लेकिन दीर्घकाल में यह लोकतंत्र को खोखला करता है। इससे यह संदेश जाता है कि संवैधानिक मर्यादाएं सत्ता की सुविधा के अनुसार बदली जा सकती हैं। ऐसी स्थिति संस्थाओं को कमजोर करती है और आम नागरिक के मन में यह आशंका पैदा करती है कि न्याय और विवेक की जगह भय और दबाव ने ले ली है।
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यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या इस तरह की कोशिशें वास्तव में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देती हैं, या फिर असहमति को अपराध की तरह पेश करने का रास्ता खोलती हैं। लोकतंत्र में आलोचना और प्रश्न पूछना अपराध नहीं, बल्कि उसकी बुनियादी शर्त है। यदि हर असुविधाजनक प्रश्न के जवाब में महाभियोग की धमकी दी जाएगी, तो बहस और विमर्श का दायरा सिमटता चला जाएगा।
समय की मांग है कि महाभियोग जैसी गंभीर संवैधानिक प्रक्रिया को राजनीतिक हथियार बनने से रोका जाए। स्वामीनाथन पर महाभियोग की कोशिश को केवल एक व्यक्ति तक सीमित मानना भूल होगी। यह लोकतंत्र की सेहत से जुड़ा मुद्दा है। संस्थाओं को डराकर नहीं, बल्कि उनकी स्वतंत्रता और गरिमा को बनाए रखकर ही एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र की स्थापना संभव है।
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