पुनीत मिश्र
हिंदी साहित्य की वह उजली धारा, जिसमें प्रकृति, मानवता और सौंदर्य एक साथ प्रवाहित होते हैं। उसका नाम सुमित्रानंदन पंत है। उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण करते हुए यह स्पष्ट होता है कि पंत केवल कवि नहीं थे, बल्कि हिंदी कविता को नई दृष्टि, नई भाषा और नई संवेदना देने वाले युगप्रवर्तक साहित्यकार थे।
पंत का काव्य जीवन प्रकृति से गहरे जुड़ाव का उदाहरण है। हिमालय की गोद में पले-बढ़े पंत की रचनाओं में पर्वत, वन, पुष्प, पवन, नदी और आकाश केवल दृश्य नहीं, बल्कि जीवंत अनुभूतियाँ बनकर उपस्थित होते हैं। उनकी कविता में प्रकृति मानवीय संवेदना से संवाद करती है। कभी आनंद देती है, कभी करुणा, तो कभी आत्मचिंतन का अवसर।
छायावाद के प्रमुख स्तंभों में गिने जाने वाले पंत ने हिंदी कविता को कोमलता, लय और सौंदर्य से समृद्ध किया। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी सहज और प्रवाहमयी है। “पल्लव”, “गुंजन”, “युगांत”, “लोकायतन” जैसी कृतियाँ उनके काव्य-विकास की विविध दिशाओं को रेखांकित करती हैं। प्रारंभिक काव्य में जहां प्रकृति और सौंदर्य का स्वप्निल संसार है, वहीं आगे चलकर उनकी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, मानव-मूल्य और प्रगतिशील चेतना का स्पष्ट स्वर दिखाई देता है।
पंत का साहित्य केवल भावनाओं का संसार नहीं रचता, बल्कि विचारों की जमीन भी तैयार करता है। वे व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ते हैं, समाज से जोड़ते हैं और अंततः मानवता के व्यापक सरोकारों से जोड़ते हैं। उनकी कविताएँ पाठक को भीतर से परिष्कृत करती हैं। संवेदनशील बनाती हैं, सोचने को विवश करती हैं।
हिंदी साहित्य में उनके अवदान को पद्मभूषण, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों द्वारा मान्यता मिली। ये सम्मान उनकी रचनात्मक ऊँचाइयों और साहित्यिक प्रभाव की स्वीकृति हैं, परंतु उनकी वास्तविक उपलब्धि वह पीढ़ियाँ हैं जो आज भी उनकी कविताओं में सौंदर्य, शांति और मानवीय मूल्य खोजती हैं।
पुण्यतिथि पर सुमित्रानंदन पंत का स्मरण केवल अतीत को नमन करना नहीं, बल्कि उस काव्य-दृष्टि को जीवित रखना है जो प्रकृति के साथ सामंजस्य, मनुष्य के भीतर करुणा और समाज में सौंदर्य की स्थापना करती है। पंत की कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। क्योंकि प्रकृति, संवेदना और मानवता की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होती।
