ग़ैरों के ख़यालात की लेते हैं ख़बर
खुद के गिरेबान में झांका नहीं जाता!
बस्ती में ख़ूब सियासत की जाती है,
उनकी आवाज़ को कोई नहीं उठाता।
ग़ैरों की बुराई न देखूँ वो नज़र दे,
खुद की बुराई परखने का हुनर दे,
तन के खड़े रहे जो जड़ से उखड़ गये,
हवाओं के रुख़ से वाक़िफ़ नहीं थे !
मगरूर जितने पेड़ थे, हैरत में पड़ गए,
आंधियां चलीं तो जड़ों से उखड़ गए,
ग़ैरों की ग़ुलामी पर रज़ामंद है तू,
शिकवा तुझसे नहीं ग़ैरों से ही है।
नज़र नहीं नज़ारों की बात करते हैं,
जमीं पर सितारों की बात करते हैं,
वो हाथ जोड़कर बस्ती लूटने वाले,
महफ़िल में सुधारों की बात करते हैं।
इतने ग़म मिले कि आँसू सूख गये,
रोना भी चाहो तो अब मन नहीं करता,
बड़े घाटे का सौदा है ये साँस लेना,
उम्र बढ़ती है, जीवन कम हो जाता।
मुफ़लिसी में न कोई काम आता है,
चिता जलाने हर कोई आ जाता है,
अहमियत अल्फ़ाज़ की होती है,
असर तो हरदम लहजे का होता है।
कभी ग़म फिर कभी हँसी बेची,
और कभी खुद की बेबसी बेंची,
ज़िंदगी की साँसे ख़रीदने के लिये,
आदित्य रोज़ थोड़ी ज़िंदगी बेंची।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य ‘
लखनऊ
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