श्रीराम का घर छोड़ना, षडयंत्र से घिरे,
एक भावी राजा की भावुक कथा है,
परंतु श्रीकृष्ण का घर छोड़ना एक
गूढ़तम कूटनीति के तहत आता है।
श्रीराम मर्यादा निभाने में कष्ट सहते हैं,
श्रीकृष्ण षडयंत्रों पर विजय पाते हैं,
बल्कि बे स्थापित परंपरा को चुनौती
देकर एक नई परंपरा को जन्म देते हैं।
राम से कृष्ण होना युगीन प्रक्रिया है,
राम को मारीच माया भ्रमित करती है,
पर श्री कृष्ण को पूतना के छलावे की,
माया किंचित उलझा नहीं सकती है।
श्रीराम लक्ष्मण को मूर्छित देखकर
खुद बेसुध हो कर बिलख पड़ते हैं,
पर श्रीकृष्ण अभिमन्यु को दांव पर
लगाने से किंचित भी नहीं हिचकते हैं।
श्रीराम राजा, श्रीकृष्ण राजनीति थे,
राम स्वयं रण थे, कृष्ण रणनीति थे,
श्रीराम मानव मूल्यों के लिए लड़ते थे,
श्रीकृष्ण धर्म, मानवता हेतु लड़ते थे।
मनुष्य की यात्रा जो श्रीराम से ही शुरू
होती है, समय उसे श्रीकृष्ण बनाता है,
जितना श्रीराम होना ज़रूरी होता है,
श्रीकृष्ण होना उतना ही जरूरी है।
लेकिन त्रेता युग के श्रीराम से प्रारंभ
हुई यह यात्रा तब तक अधूरी ही है,
जब तक ऐसी यात्रा का समापन
द्वापर के श्रीकृष्ण पर नही होता है।
दोनो अवतारी थे, पर थे मनुष्य जैसे,
श्री हरि विष्णु थे, राम व कृष्ण जैसे,
आदित्य सूर्यवंश की मर्यादा राम थे,
यदुवंश का धैर्य योगेश्वर कृष्ण थे।
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