Tuesday, February 17, 2026

शिव कृपा

बूंद बूंद जो होती निसृत

चलअविचल आकाश से

भीग भीग है जाता अंतस

शिव के इस परिभाष से

शिरा शिरा जो होती कम्पित

रुधिराई आवेगों से

ठहर ठहर हैं जाते चक्षु

शिव के इस अभिलाष से

रोम रोम जो चेतन होता

दीप ऊर्जा माला से

स्पंदन गमकित हो जाता

शिव के इस उच्छवास से

निमिष निमिष आनंद उतरता

मनमहेश छवि धर लेने से

प्रस्फुटित होती अश्रु माला

शिव के इस उद्भास से

क्षण क्षण अक्षर क्षर हो जाता

अनहद का इक गूँज ही रहता

घटित प्रज्वलित आत्मज्योति

शिव के इस चिदाभास से

* क्लीं जायसवाल

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments