Friday, January 16, 2026
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शिव और मोक्ष: शास्त्रों में वर्णित मुक्ति का परम रहस्य

🔱 शास्त्रों में शिव—धर्म की जड़, आस्था की धड़कन और मोक्ष का महाद्वार


ने हमें सिखाया कि शिव बाहर नहीं, भीतर हैं—
पूजा कर्म नहीं, चेतना है;
भक्ति झुकना नहीं, जागना है।
जहाँ श्वास चलती है, वहीं शिव नृत्य करते हैं।
अब कथा एपिसोड 10 में हम उस शास्त्रोक्त यात्रा पर प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ शिव केवल अनुभूति नहीं, बल्कि धर्म की आधारशिला, आस्था का शिखर और मोक्ष का सुनिश्चित मार्ग बनकर प्रकट होते हैं। यह कथा वेद, उपनिषद, शिवपुराण, लिंगपुराण और महाभारत के शास्त्रोक्त प्रमाणों से सुसज्जित है—एक ऐसी दिव्य गाथा, जो पाठक को केवल पढ़ने नहीं, जीने के लिए विवश कर दे।
शिव: आदि, अनंत और अद्वैत सत्य

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शास्त्र कहते हैं—
“एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थे” (श्वेताश्वतर उपनिषद)
अर्थात रुद्र एक ही हैं, उनके समान दूसरा कोई नहीं।
शिव किसी एक लोक, एक रूप या एक समय में सीमित नहीं हैं। वे आदि हैं—जिनसे सृष्टि का उद्गम हुआ, और अनंत हैं—जिनमें सृष्टि विलीन होती है। वे सगुण भी हैं, निर्गुण भी। यही कारण है कि उन्हें महादेव कहा गया—देवों के भी देव।
धर्म का मूल स्तंभ: शिव का शास्त्रोक्त स्वरूप
धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि धारण करने योग्य जीवन-पद्धति है।
शिव इस धर्म के मूल में हैं।
जटाओं में गंगा—संयम में करुणा
कंठ में विष—त्याग का परम उदाहरण
भस्म का लेपन—अनित्य संसार की स्मृति
त्रिनेत्र—ज्ञान, इच्छा और क्रिया का संतुलन

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शिवपुराण कहता है—
“धर्मो रक्षति रक्षितः”—
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
और धर्म की रक्षा स्वयं शिव करते हैं।
आस्था: भय से नहीं, विश्वास से जन्मी
शिव की भक्ति भयजनित नहीं, विश्वासजनित है।
वे दंड नहीं देते, दिशा देते हैं।
रावण जैसा अहंकारी भी जब शिव तांडव स्तोत्र में लीन हुआ, तो शिव ने उसे शत्रु नहीं, भक्त के रूप में स्वीकार किया। यह शास्त्रों की सबसे बड़ी शिक्षा है—
शिव भक्ति में पात्रता नहीं, प्रामाणिकता देखी जाती है।
समानता का प्रतीक: शिव का सामाजिक दर्शन

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शिव ही ऐसे देव हैं जो—
देवों में पूजे जाते हैं
असुरों में भी आदरणीय हैं
ऋषियों के आराध्य हैं
और भूत-प्रेत, गंधर्व, किन्नर—सबके स्वामी हैं
यह समानता का शाश्वत संदेश है।
कैलास पर कोई ऊँच-नीच नहीं—
नंदी से लेकर नाग तक, सब समान हैं।
यही कारण है कि शिव को लोकदेव कहा गया—जो हर वर्ग, हर चेतना, हर प्राणी के अपने हैं।
कथा: शिव और मार्कंडेय—मोक्ष का अमर प्रमाण
शिवपुराण की यह कथा मोक्ष का जीवंत उदाहरण है।
ऋषि मृकंडु के पुत्र मार्कंडेय को अल्पायु का श्राप था। मृत्यु के दिन यमराज स्वयं आए। भयभीत बालक शिवलिंग से लिपट गया और ॐ नमः शिवाय का जप करने लगा।

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यमराज ने पाश फेंका—
पर वह शिवलिंग सहित मार्कंडेय को बाँधने लगा।
तभी शिव प्रकट हुए—
काल भी काँप उठा।
शिव ने यम को रोका और कहा—
“जो मेरी शरण में है, उसे मृत्यु छू भी नहीं सकती।”
यही है मोक्ष का रहस्य—
शिव की शरण, अहंकार का विसर्जन और चेतना का जागरण।
मोक्ष: मृत्यु के बाद नहीं, जीवन में
शिव दर्शन में मोक्ष कोई मृत्यु-उपरांत पुरस्कार नहीं,
बल्कि जीवन की अवस्था है।
उपनिषद कहते हैं—
“जीवन्मुक्तः स उच्यते”
जो जीते-जी मुक्त हो जाए, वही सच्चा मुक्त है।
शिव ध्यान, शिव योग, शिव ज्ञान—
ये सब मन को बंधनों से मुक्त करते हैं।
जब वासना, भय और अहंकार समाप्त होता है,
तभी भीतर शिवत्व प्रकट होता है।
शिवलिंग: निराकार से साकार की यात्रा
शिवलिंग कोई मूर्ति नहीं—
वह ऊर्जा का प्रतीक है।
गोलाकार आधार—प्रकृति
ऊर्ध्व लिंग—पुरुष
दोनों का संगम—सृष्टि का रहस्य
लिंगपुराण स्पष्ट करता है कि शिवलिंग
अनंत ब्रह्म का प्रतीक है—
जिसका न आदि है, न अंत।
शिव और साधक: गुरु और शिष्य का संबंध
शिव आदिगुरु हैं।
योग, ध्यान, तंत्र—सबकी शुरुआत उनसे हुई।
नटराज रूप में उनका तांडव बताता है—
सृजन
संरक्षण
संहार
तिरोभाव
अनुग्रह
यही पंचकृत्य साधक को भी करना होता है—
अपने भीतर के अज्ञान का संहार कर,
ज्ञान का सृजन करना।
भावनात्मक निष्कर्ष: शिव तुम ही हो
यह कथा यहीं समाप्त नहीं होती—
क्योंकि शिव कोई दूरस्थ देव नहीं।
जब तुम—
सत्य बोलते हो
करुणा दिखाते हो
अहं त्यागते हो
और मौन में उतरते हो
तभी एपिसोड 10 पूर्ण होता है।
क्योंकि तब शिव कथा नहीं, अनुभव बन जाते हैं।

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