✍️ सीमा त्रिपाठी
(शिक्षिका, साहित्यकार, लेखिका एवं अध्यक्ष – महिला शिक्षक संगठन)
बेटी जन्मी तो घर में सन्नाटा सा छा गया,
पिता को जिम्मेदारी का एहसास हो गया।
पढ़ा-लिखा कर बेटी को जो बड़ा किया,
दहेज के लिए पाई-पाई जोड़ना शुरू किया।
बेटी जन्मी तो घर में सन्नाटा सा छा गया।।
अपने से ऊंचे घर में बेटी को ब्याहेगे,
पर क्या पता था लोभियों के हाथ बेचेंगे।
जेवर, सामान, गाड़ी देकर बिटिया विदा किया,
जान से प्यारी घर की अमानत दे दिया।
बेटी जन्मी तो घर में सन्नाटा सा छा गया।।
ससुराल में बेटी से पहला सवाल था,
“कुछ भी ना मिला है” यही मलाल था।
क्या दोष था उसका, क्या कसूर था,
बेटी की जिंदगी में दहेज नासूर था।
बेटी जन्मी तो घर में सन्नाटा सा छा गया।।
मारा गया, पीटा गया, ताना दिया गया,
दहेज ना मिला तो जिंदा जला दिया गया।
संकल्प हम सभी को यह करना ही होगा,
दहेज रूपी दानव को भगाना ही होगा।
बेटी जन्मी तो घर में सन्नाटा सा छा गया।।
अब अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बनाएंगे,
बेटा-बेटी का हर अंतर मिटाएंगे।
हर क्षेत्र में बेटियों को आगे बढ़ाएंगे,
जुल्म और अत्याचार से लड़ना सिखाएंगे।
बेटी जन्मी तो घर में सन्नाटा सा छा गया।।
कविता का संदेश
सीमा त्रिपाठी की यह रचना समाज के हर वर्ग को यह सोचने पर मजबूर करती है कि बेटियां दहेज नहीं, सम्मान की हकदार हैं। यह कविता एक आह्वान है — बेटियों को आत्मनिर्भर बनाइए, ताकि वे किसी के रहम की नहीं, अपनी मेहनत की मिसाल बनें।
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