छिहत्तर वर्ष, जीवन का तीन-चौथाई सफ़र,
आज़ादी के शताब्दी पर्व तक अब
केवल चौबीस वर्ष शेष हैं,
यह समय भारत के लिए निर्णायक विशेष है।
इसी काल को अमृत काल कहा गया,
पर अमृत कलश कितना भरा, कितना रिक्त है,
यह आत्ममंथन का विषय है,
क्योंकि जन-गण की दशा आज भी प्रश्न है।
कर्तव्य पथ पर राष्ट्रपति शान से
तिरंगा ध्वज फहराएंगे,
विशिष्ट जन, विशिष्ट समारोह,
लोकतंत्र के उत्सव के साक्षी बन जाएंगे।
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लोकतंत्र का तंत्र मज़बूत दिखता है,
पर लोक कल्याण कहाँ तक पहुँचा है,
ग़रीब जनता समारोह में नहीं होती,
क्योंकि उनके पास वहाँ पहुँचने का पास नहीं होता।
विशिष्टता की शिष्टता तो दिखेगी,
पर क्या उससे भूख और प्यास मिटेगी,
वे करोड़ों लोग जो जूठी-सूखी रोटी पर
जीवन गुज़ारते हैं, उनकी सुध कौन लेगी।
भारत का गणतंत्र तभी सार्थक है,
जब सबको समान अधिकार मिलें,
संविधान की आत्मा भी तभी जीवित है,
जब हर नागरिक को सम्मान से जीने के अवसर मिलें।
आदित्य, महलों में रहने वालों से आग्रह है,
झुग्गी-झोपड़ी वालों की दशा भी देखें,
जिनके सिर पर छत नहीं,
उनके लिए छत, भोजन और गरिमा की व्यवस्था करें।
— डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
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