विरह, प्रतीक्षा और स्मृतियों की सजीव कविता
अकेला रह नहीं पाता
डाकिया अब कोई पाती
तुम्हारी क्यों नहीं लाता
लाख करता हूँ कोशिश मैं
अकेला रह नहीं पाता
मिलन की आस लेकर
आज भी बैठा हूँ मैं लेकिन
मगर अब आजकल कोई
यहाँ मिलने नहीं आता..।।
चहकतीं थीं कभी चिड़ियां
तो मैं संगीत बुनता था
पिरोने को पुष्प माला
सुगंधित पुष्प चुनता था
आँखें पलकें बिछाए
देखती हैं आज भी रस्ता
कोई खुशियों के आंसू अब
यहाँ देकर नहीं जाता..।।
मुझे है फ़िक्र उनकी
आजकल किस हाल में होंगे
ना जाने कौन सी रंगत
और किस चाल में होंगे
उन्हें शायद मिला होगा
कोई अब और मनुहारी
“विजय” मुझको तुम्हारे बाद
कोई अब नहीं भाता..।।
“विजय” मुझको तुम्हारे बाद
कोई अब नहीं भाता..।।
विजय कनौजिया
ग्राम व पत्रालय-काही
जनपद-अम्बेडकर नगर
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