Saturday, January 24, 2026
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धारा 17-ए: ईमानदार अफसरों की सुरक्षा या भ्रष्टाचार की वैधानिक ढाल?

विजन 2047 और भ्रष्टाचार-मुक्त भारत का संकल्प: धारा 17-ए—ईमानदारी की ढाल या भ्रष्टाचार का हथियार? एक समग्र विश्लेषण


भारत जब अपनी स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करने की ओर अग्रसर है, तब विजन 2047 के अंतर्गत एक ऐसे राष्ट्र का संकल्प लिया गया है, जहाँ भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता केवल नारा नहीं, बल्कि शासन की मूल आत्मा हो। किंतु किसी भी लोकतंत्र में नीतिगत संकल्प तभी सफल होते हैं, जब उन्हें लागू करने वाला कानूनी ढाँचा स्वयं विरोधाभासों से मुक्त हो। आज भारत में यही विरोधाभास भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में जोड़ी गई धारा 17-ए के रूप में सामने खड़ा है, जो एक ओर ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा का दावा करती है, तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार-मुक्त शासन के लक्ष्य को कमजोर करती प्रतीत होती है।

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मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया (महाराष्ट्र), यह मानता हूँ कि भ्रष्टाचार किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए केवल आर्थिक नुकसान का कारण नहीं होता, बल्कि यह जनता के विश्वास, संस्थाओं की साख और कानून के राज को भीतर से खोखला कर देता है। विश्व बैंक, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच बार-बार यह रेखांकित कर चुके हैं कि भ्रष्टाचार सीधे तौर पर गरीबी, असमानता और सामाजिक अशांति को बढ़ाता है। भारत जैसे विकासशील लोकतंत्र में, जहाँ करोड़ों लोग सरकारी योजनाओं और निर्णयों पर निर्भर हैं, वहाँ भ्रष्टाचार का प्रभाव और भी विनाशकारी हो जाता है।
इसी पृष्ठभूमि में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 बनाया गया था। इसका मूल उद्देश्य लोकसेवकों को जवाबदेह बनाना, रिश्वत, पद के दुरुपयोग और सत्ता के दुराचार को आपराधिक कृत्य घोषित करना तथा जनता के संसाधनों और अधिकारों की संवैधानिक रक्षा करना था। इस अधिनियम की आत्मा यह मानकर चलती थी कि लोकसेवक का पद एक ट्रस्ट है, न कि विशेषाधिकार।

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वर्ष 2018 में केंद्र सरकार द्वारा इस अधिनियम में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया गया, जिसके तहत धारा 17-ए जोड़ी गई। इस धारा के अनुसार, किसी भी लोकसेवक के विरुद्ध उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णयों या की गई सिफारिशों के संबंध में, बिना पूर्व अनुमति कोई जांच, पूछताछ या एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। यह अनुमति संबंधित सरकार या सक्षम प्राधिकारी द्वारा दी जानी होती है।
सरकार का तर्क है कि अधिकारी प्रतिदिन ऐसे निर्णय लेते हैं जिनका प्रभाव करोड़ों लोगों पर पड़ता है। हर निर्णय सभी को पसंद नहीं आता। यदि हर असंतुष्ट व्यक्ति एफआईआर दर्ज करा सके, तो प्रशासन ठप हो जाएगा। अधिकारी भय के माहौल में काम करेंगे और विकास की गति धीमी पड़ेगी। सरकार के अनुसार, धारा 17-ए ईमानदार अधिकारियों को राजनीतिक प्रतिशोध से बचाने की एक आवश्यक ढाल है।

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लेकिन मूल प्रश्न यही है—क्या सुरक्षा के नाम पर जांच पर ताला लगाया जा सकता है? लोकतंत्र में जांच एजेंसियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी स्वतंत्रता होती है। यदि जांच शुरू करने के लिए भी उसी शासन से अनुमति लेनी पड़े, जिसके खिलाफ जांच संभावित है, तो क्या यह व्यवस्था निष्पक्ष कही जा सकती है? आलोचकों का कहना है कि यह प्रावधान जांच एजेंसियों को नाममात्र की स्वतंत्रता देता है और उन्हें कार्यपालिका के अधीन कर देता है।
आज के समय में भ्रष्टाचार केवल रिश्वत तक सीमित नहीं है। आधुनिक लोकतंत्रों में सबसे बड़ा और सबसे अदृश्य खतरा नीतिगत भ्रष्टाचार है—टेंडर और ठेके, लाइसेंस और अनुमति, खनन, भूमि, बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ, रक्षा और सार्वजनिक खरीद। यदि इन्हीं फैसलों को जांच से बाहर कर दिया जाए, तो भ्रष्टाचार कानून का अस्तित्व ही सीमित और लगभग निरर्थक हो जाता है।

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धारा 17-ए का एक और गंभीर पहलू है राजनीतिक संरक्षण और हितों का टकराव। यदि किसी मामले में सरकार स्वयं शामिल हो या उच्च स्तर पर मिलीभगत हो, तो अनुमति मिलने की संभावना न के बराबर रह जाती है। यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था में हितों के टकराव का क्लासिक उदाहरण बन जाती है।
इसी चिंता को लेकर सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (CPIL) ने सुप्रीम कोर्ट में इस धारा को चुनौती दी। याचिका में कहा गया कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (न्यायपूर्ण प्रक्रिया) का उल्लंघन करता है तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करता है।

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भ्रष्टाचार के मामलों में समय सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है। जांच में देरी से साक्ष्य नष्ट हो सकते हैं, गवाह प्रभावित हो सकते हैं, फाइलें बदली जा सकती हैं, दस्तावेज गायब हो सकते हैं और डिजिटल सबूत मिटाए जा सकते हैं। यदि जांच शुरू होने में ही महीनों लग जाएँ, तो सच्चाई तक पहुँचना लगभग असंभव हो जाता है। इसका एक अप्रत्यक्ष लेकिन गहरा प्रभाव यह भी है कि ईमानदार नागरिक, अधिकारी, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता शिकायत करने से पहले सौ बार सोचने लगते हैं। यह स्थिति व्हिसलब्लोअर संस्कृति को कमजोर कर देती है, जो किसी भी पारदर्शी लोकतंत्र की रीढ़ होती है।
13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले में खंडित फैसला सुनाया। एक माननीय न्यायाधीश ने धारा 17-ए को असंवैधानिक बताते हुए इसे रद्द करने की राय दी, जबकि दूसरे न्यायाधीश ने इसे ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानते हुए वैध ठहराया, लेकिन लोकपाल/लोकायुक्त की भूमिका के साथ। यह मतभेद स्वयं इस बात का प्रमाण है कि मुद्दा कितना जटिल और संवेदनशील है। अब यह मामला बड़ी पीठ के समक्ष जाएगा, जहाँ यह तय होगा कि संविधान का कौन-सा पक्ष अधिक मजबूत है और लोकतंत्र की दीर्घकालिक आवश्यकता क्या है।

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आगे तीन संभावित रास्ते दिखाई देते हैं—पहला, धारा 17-ए को पूरी तरह रद्द किया जाए; दूसरा, इसे संशोधित कर सीमित रूप में लागू किया जाए; तीसरा, एक नया संतुलित मॉडल विकसित किया जाए, जिसमें जांच की स्वतंत्रता भी बनी रहे और ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।
वैश्विक दृष्टिकोण से देखें तो अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जापान जैसे देशों में लोकसेवकों के खिलाफ जांच के लिए कार्यपालिका की पूर्व अनुमति की शर्त नहीं होती। वहाँ स्वतंत्र अभियोजन और न्यायिक निगरानी को प्राथमिकता दी जाती है। यही कारण है कि नीतिगत भ्रष्टाचार पर भी प्रभावी कार्रवाई संभव हो पाती है।
यदि भारत वास्तव में विजन 2047 के तहत भ्रष्टाचार-मुक्त, पारदर्शी और जवाबदेह शासन चाहता है, तो उसे धारा 17-ए जैसी कानूनी लीकेजेस को बंद करना होगा, जांच एजेंसियों को वास्तविक स्वतंत्रता देनी होगी और राजनीतिक इच्छाशक्ति को मजबूत कानूनी ढाँचे में बदलना होगा।

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अतः समग्र विश्लेषण यही संकेत देता है कि सुरक्षा और जवाबदेही के बीच संतुलन अनिवार्य है। ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर जांच को बंधक बनाना लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। भ्रष्टाचार से लड़ाई में कानून को ढाल नहीं, बल्कि तलवार बनना होगा। अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ पर हैं, जिसका फैसला न केवल धारा 17-ए का भविष्य तय करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि भारत का लोकतंत्र 2047 की ओर किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

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— संकलनकर्ता: लेखक-कानूनी विशेषज्ञ, स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा, सीए(एटीसी), एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र

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