जनाब! अपनी समस्याओं को सुलझाने और समाधान तलाशने के लिए अब केवल इंसान ही टंकी पर नहीं चढ़ते, जानवर भी इस नई परंपरा में शामिल होने लगे हैं। फर्क इतना है कि इंसान के टंकी पर चढ़ने के पीछे कोई मांग, नाराजगी या फिल्मी अंदाज हो सकता है, जबकि जानवर आखिर किस मांग को लेकर ऊपर पहुंच जाएं, यह समझना थोड़ा मुश्किल है।
श्योपुर के ददूनी गांव में एक सांड करीब 60 फीट ऊंची पानी की टंकी पर जा चढ़ा। नीचे गांव वाले खड़े थे, ऊपर सांड था और बीच में सबसे बड़ा सवाल था—अब इसे नीचे कौन उतारेगा?
पानी की टंकी पर इंसान के चढ़ने की बात करें तो सबसे पहले फिल्म ‘शोले’ के वीरू की याद आती है। बसंती को पाने के लिए वीरू का टंकी पर चढ़ना आज भी लोगों को याद है। लेकिन अब लगता है कि टंकी पर चढ़ने का यह अधिकार केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं रहा।
सांड ने आखिर टंकी पर चढ़ने का फैसला क्यों किया, यह तो वही जाने। हो सकता है नीचे की दुनिया से कुछ शिकायत रही हो। शायद उसने सोचा हो—“जब इंसान छोटी-छोटी बातों पर ऊपर चढ़ जाते हैं, तो मैं भी देखूं कि ऊपर पहुंचकर दुनिया कैसी दिखाई देती है!”
लेकिन ऊपर पहुंचने के बाद शायद उसे समझ आया होगा कि ऊंचाई हासिल करना आसान है, मगर नीचे लौटने की व्यवस्था उतनी आसान नहीं।
सांड करीब 42 घंटे तक टंकी पर डटा रहा। नीचे गांव वाले कभी चिंता में उसे देखते, कभी सलाह देते और कभी उम्मीद करते कि शायद वह खुद ही रास्ता खोजकर नीचे उतर आए। मगर सांड भी मानो ठान चुका था कि जब मामला इतना चर्चित हो गया है, तो अब बिना सरकारी इंतजाम के नीचे उतरना क्यों?
आखिरकार पुलिस, पशुपालन विभाग और प्रशासन की टीम सक्रिय हुई। क्रेन मंगाई गई और करीब दो घंटे चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद सांड को सुरक्षित नीचे उतार लिया गया।
यहां दिलचस्प बात यह रही कि सांड भले ही टंकी के ऊपर था, लेकिन असली परीक्षा नीचे खड़े पूरे तंत्र की हो रही थी।
लोकतंत्र और व्यवस्था में भी कभी-कभी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। कोई समस्या छोटी हो तो उसे नजरअंदाज किया जाता है। समस्या थोड़ी बड़ी हो जाए तो चर्चा शुरू होती है। जब समस्या बहुत ऊपर पहुंच जाए, तब बैठक, निरीक्षण, टीम, योजना और ऑपरेशन की बारी आती है।
अपनी तो इतनी ऊंचाई का नाम सुनते ही पुंगी बज जाती है!
हालांकि इस मामले में प्रशासन ने अंततः मोर्चा संभाला और सांड को सुरक्षित नीचे उतार लिया। इसलिए व्यवस्था को पूरी तरह बेबस कहना भी उचित नहीं होगा। बाबू, मुस्तैदी तो बड़ी जबरदस्त है—बस कभी-कभी समस्या की ऊंचाई देखकर व्यवस्था को अपनी सक्रियता की ऊंचाई तय करनी पड़ती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक गैर-दलीय, मगर बड़ा दिलचस्प संदेश भी दे दिया—ऊपर पहुंच जाना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन सुरक्षित नीचे उतारना असली प्रबंधन है।
भइये, अब सांड जमीन पर है। टंकी खाली है। क्रेन वापस जा चुकी है और गांव वालों की चिंता भी खत्म हो गई है। लेकिन घटना एक मजेदार सवाल जरूर छोड़ गई है—
अगर एक सांड को 60 फीट की ऊंचाई से नीचे उतारने में 42 घंटे लग सकते हैं, तो जो समस्याएं वर्षों से व्यवस्था की ऊंची टंकियों पर बैठी हैं, उनके लिए क्रेन कब आएगी?
फिलहाल सांड ने अपना काम कर दिया। वह ऊपर चढ़ा, सबका ध्यान खींचा और आखिरकार सुरक्षित नीचे भी आ गया।
अब बारी हमारी है कि उससे कम से कम इतना तो सीखें कि ऊंचाई चाहे कितनी भी हो, नीचे उतरने का रास्ता पहले से पता होना चाहिए।
क्योंकि हर बार क्रेन उपलब्ध हो जाए, यह जरूरी नहीं!
— संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक, समीक्षक एवं स्तंभकार
इंदौर-452011, मध्य प्रदेश
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