
लेखक: संजय एम तराणेकर
अखबार की खबर पढ़कर मन में एक गंभीर सवाल उठता है—आखिर ये कैसे शातिर डकैत हैं, जो पेट्रोल पंप पर डकैती डालने की योजना बनाते-बनाते ही पुलिस के हत्थे चढ़ जाते हैं? डकैती की योजना इतनी गोपनीय थी कि शायद उन्होंने बाकायदा एजेंडा बनाकर बैठक में पढ़ा होगा—“आज की मीटिंग का विषय: पेट्रोल पंप लूटने की तैयारी।” हमारे देश की पुलिस भी धन्य है। डकैती हुई नहीं, पेट्रोल पंप लुटा नहीं, कैश बॉक्स खुला नहीं और पुलिस ने पहले ही पाँच शातिरों को दबोच लिया। यानी पुलिस ने अपराध को होने से पहले ही पकड़ लिया। इसे कहते हैं—‘अपराध रोकथाम का एडवांस वर्जन।’
शायद बदमाशों ने सोचा होगा कि पहले जगह का निरीक्षण कर लेते हैं। कौन-सा पेट्रोल पंप सुविधाजनक है, कितनी रकम मिल सकती है और भागने का रास्ता क्या होगा—इन सब पर गंभीर ही नहीं, गहन चिंतन चल रहा होगा। तभी पुलिस ने उनकी चिंतन-सभा में अचानक प्रवेश कर दिया। अब बेचारे बदमाश सोच रहे होंगे—“डकैती डालने का तो मौका मिला नहीं, ऊपर से पुलिस ने हमारी मीटिंग भी रद्द कर दी! यह कोई ऐसी-वैसी मीटिंग थोड़ी थी, जिसकी परमिशन ली जाए!”
सच है, आजकल अपराध करना भी आसान नहीं रहा। पहले अपराधी योजना बनाते थे, फिर अपराध करते थे और पुलिस बाद में जांच करती थी। सब कुछ निपटने के बाद पुलिस की एंट्री होती थी। फिर डॉग एक्सपर्ट को कुत्ते से कपड़ा वगैरह सुंघाने का काम सौंपा जाता था। चोरी या डकैती के शिकार व्यक्ति को जब डॉग एक्सपर्ट के कुत्ते दिखाई देते, तो उसके मन में उम्मीद जग जाती कि अब चोरी गया सामान जरूर वापस मिल जाएगा। लेकिन अब व्यवस्था इतनी आधुनिक हो गई है कि अपराधी योजना बनाता है और पुलिस पहले ही उसका ‘प्रोजेक्ट’ बंद कर देती है।
इस खबर का सबसे मजेदार पहलू यह है कि डकैतों की योजना पुलिस से ज्यादा उनके अपने लोगों को पता थी। आखिर सूचना पुलिस तक पहुंची कैसे? लगता है अपराधियों ने भी सोशल मीडिया की तर्ज पर अपनी योजना का प्रचार-प्रसार कर दिया होगा। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर पूछा होगा—“क्या चल रहा है?” बदमाश बोले होंगे—“कुछ नहीं साहब, बस पेट्रोल पंप के बारे में चर्चा कर रहे थे।” पुलिस ने कहा होगा—“अच्छा! तो हथियार, गाड़ी और लूट की योजना भी इसी चर्चा का हिस्सा है?”
बस, फिर क्या था! ‘चर्चा’ सीधे गिरफ्तारी में बदल गई। पुलिस के लिए यह उपलब्धि और बदमाशों के लिए सीख है कि डकैती डालने से पहले कम-से-कम अपनी योजना को ‘गोपनीय’ रखना सीखो! क्योंकि आज के दौर में अपराध करना जितना मुश्किल है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है अपराध की योजना को पुलिस से बचाकर रखना।
और पेट्रोल पंप वालों के लिए तो यह खबर राहत की है—पंप पर पेट्रोल भले महंगा हो गया हो, लेकिन फिलहाल डकैतों का ‘प्लान’ जरूर सस्ता पड़ गया!
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
