
गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग में संस्कृत सप्ताह समारोह का शुभारंभ शुक्रवार को हुआ। उद्घाटन अवसर पर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. राजवंत राव ने की। उन्होंने संस्कृत ग्रंथों के छोटे-छोटे पात्रों और उनके संवादों के उदाहरणों से सामाजिक चेतना को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शास्त्रों की सामाजिकता को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर विद्यार्थियों को प्रेरणा लेनी चाहिए। संस्कृत साहित्य में छंद, रस, अलंकार के माध्यम से जीवन के समस्त पक्षों को सहजता से अभिव्यक्त किया गया है, जो सम्पूर्ण मानवता के लिए मूल्यवान संदेश लेकर आते हैं।
मुख्य वक्ता के रूप में जवाहरलाल नेहरू केंद्रीय विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. संतोष कुमार शुक्ल ने संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि समूची भारतीय ज्ञान परंपरा की संवाहिका है। व्याकरण, दर्शन, इतिहास, गणित, ज्योतिष, कला, हर क्षेत्र की जड़ें संस्कृत में हैं। उन्होंने कहा कि विश्व की भाषाओं में संस्कृत का व्याकरण सर्वश्रेष्ठ और भाषाविज्ञान की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।
प्रो. शुक्ल ने बताया कि संख्या प्रविधि, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, योग, दर्शन—सभी ज्ञान-विज्ञान संस्कृत साहित्य में निहित हैं। उन्होंने इस बात पर भी खेद जताया कि आज के दौर में संस्कृत का जितना विकास होना चाहिए था, उतना नहीं हो पाया है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि हर व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक संस्कृत ग्रंथ अवश्य पढ़ना चाहिए। परंपरा के संरक्षण, अंतःशास्त्रीय अध्ययन, पाश्चात्य ग्रंथों के संस्कृत में अनुवाद और शास्त्रों के प्रचार-प्रसार को आवश्यक बताते हुए उन्होंने संस्कृत दिवस की शुभकामनाओं के साथ अपने वक्तव्य का समापन किया।
कार्यक्रम का संचालन शोध छात्रा भूमिका द्विवेदी ने किया। स्वागत विभागीय समन्वयक डॉ. देवेंद्र पाल और धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम संयोजक डॉ. रंजन लता ने किया।
यह आयोजन एक सप्ताह तक चलेगा, जिसमें संस्कृत से संबंधित विविध प्रतियोगिताएं और व्याख्यान आयोजित किए जाएंगे।
इस अवसर पर विभाग के समस्त शिक्षक, स्नातक, परास्नातक एवं शोध छात्र उपस्थित रहे।