Sunday, February 1, 2026
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संत के आशीर्वाद से बदली किस्मत, निःसंतान ब्राह्मण को मिला पुत्र प्राप्ति का वरदान

सिकन्दरपुर बलिया(राष्ट्र की परम्परा)

एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण वर्षों से संतान सुख के लिए व्याकुल था। घर में धन, मान-सम्मान और धार्मिक वातावरण होने के बावजूद संतान के बिना उसका जीवन अधूरा लग रहा था। वह अक्सर संत-महात्माओं के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाता, पर हर बार उसे निराशा ही हाथ लगती।
एक दिन वह एक ज्ञानी संत के पास पहुँचा और विनती करने लगा—“महाराज, मुझे प्रवचन, ज्ञान या वैराग्य नहीं चाहिए। मेरे आंगन में छोटे-छोटे बच्चों की किलकारियाँ गूंजें, बस यही मेरी एकमात्र इच्छा है। पुत्र के बिना गृहस्थ जीवन सूना लगता है।”संत ने ध्यान लगाकर उसके भाग्य का विचार किया और गंभीर स्वर में बोले—“हे ब्राह्मण, तुम्हारे ललाट पर स्पष्ट लिखा है—‘सप्तजन्मावधि तव पुत्रो नैव च नैव च’अर्थात सात जन्मों तक तुम्हें संतान सुख प्राप्त नहीं होगा।”यह सुनते ही ब्राह्मण व्याकुल हो उठा। उसने संत के चरण पकड़ लिए और रोते हुए बोला, “महाराज! मैं तो इसी जन्म के दुख से टूट चुका हूँ। यदि संतान न मिली तो मैं प्राण त्याग दूँगा। परंतु मेरे मरने से आप पर ब्रह्महत्या का दोष लगेगा।”ब्राह्मण की दयनीय स्थिति देखकर संत का हृदय पिघल गया। उन्होंने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की और अंततः अपनी झोली से एक फल निकालकर ब्राह्मण को देते हुए बोले—“इदं भक्षय पल्या त्वं ततः पुत्रो भविष्यति”अर्थात यह फल अपनी पत्नी को खिला देना, इससे तुम्हें पुत्र प्राप्ति होगी।ब्राह्मण की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने हाथ जोड़कर पूछा, “महाराज, क्या इसके लिए कोई विशेष नियम पालन करना होगा?”संत ने कहा, “नियम कठिन नहीं हैं—पवित्रता का पालन करना, दिन में एक समय भोजन करना, और घर में कलह न होने देना। यदि श्रद्धा और संयम रखोगे तो ईश्वर की कृपा अवश्य होगी।”ब्राह्मण ने संत को साष्टांग प्रणाम किया और हर्षित मन से घर की ओर लौट पड़ा। यह कथा दर्शाती है कि सच्ची श्रद्धा, संतों का आशीर्वाद और दृढ़ विश्वास असंभव को भी संभव बना सकता है। उक्त बातें साध्वी साक्षी श्याम श्रीधाम वृंदावन से पधारे बुधवार की सुबह अपने मुखारविंद से प्रस्तुत की

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