हनुमान जी की लंका से अयोध्या वापसी की पौराणिक शास्त्रोक्त कथा
रामायण की अमर गाथा में यह प्रसंग अत्यंत भावनात्मक और निर्णायक है, जब हनुमान माता सीता का संदेश लेकर लंका से लौटते हैं और श्रीराम को उनके जीवन का सबसे बड़ा संबल देते हैं। परंपराओं के अनुसार हनुमान जी की लंका वापसी से अयोध्या तक की दिव्य यात्रा, उनके पराक्रम, भक्ति और संदेश-वाहक स्वरूप को उजागर करता है।
लंका से प्रस्थान — कर्तव्य, करुणा और विजय का संकल्प
माता सीता को आश्वस्त कर, उनके शिरोमणि को सुरक्षित हृदय में धारण कर, हनुमान जी लंका से प्रस्थान करते हैं। यह केवल भौगोलिक वापसी नहीं, बल्कि धर्म, सत्य और आशा की विजय यात्रा है। शास्त्र कहते हैं—हनुमान जी का प्रत्येक कदम प्रभु-कार्य से आलोकित था। लंका का आकाश साक्षी बना उस क्षण का, जब वायुपुत्र ने समुद्र-सी छाती पर उछलते हुए विजय का शंखनाद किया।
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इस वापसी में हनुमान जी का मन स्थिर था—न क्रोध, न अहंकार—केवल दास्य-भाव। यही भाव उन्हें देवताओं में भी अद्वितीय बनाता है। रास्ते में समुद्र, पर्वत और दिशाएं मानो प्रणाम कर रही थीं। यह कथा बताती है कि जब उद्देश्य पवित्र हो, तो मार्ग स्वयं सरल हो जाता है।
सागर-लांघन का पुनः स्मरण — शक्ति का संयमित प्रयोग
लंका से लौटते समय हनुमान जी पुनः समुद्र पार करते हैं। शास्त्रोक्त विवरणों में यह संकेत मिलता है कि शक्ति का वास्तविक सौंदर्य संयम में है। जहाँ पहले सागर-लांघन में परीक्षा थी, वहीं लौटते समय आश्वासन। देवताओं का मौन आशीर्वाद, दिशाओं की अनुकूलता—सब कुछ प्रभु-कार्य की सिद्धि का संकेत देता है।
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यहाँ हनुमान जी की लंका वापसी कथा हमें सिखाती है कि सफल मिशन के बाद भी विनम्रता बनी रहे—यही महानता है।
किष्किंधा में समाचार — आशा का दीप प्रज्वलित
हनुमान जी किष्किंधा पहुँचकर वानर-सेना को माता सीता के जीवित होने का शुभ समाचार देते हैं। यह समाचार युद्ध से पहले मनोबल का सर्वोच्च शिखर था। शास्त्र कहते हैं—संदेश का समय और भाव, दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
वानर-सेना में उत्साह की लहर दौड़ती है। हर हृदय में एक ही नाम—राम। यह क्षण रामायण की धुरी है, जहाँ कथा युद्ध से पहले विश्वास की नींव रखती है।
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श्रीराम से मिलन — संदेश, शिरोमणि और आँसू
हनुमान जी श्रीराम के चरणों में नतमस्तक होकर माता सीता का संदेश सुनाते हैं और शिरोमणि अर्पित करते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि शिरोमणि को देखते ही श्रीराम के नेत्र सजल हो उठते हैं—यह आँसू पराजय के नहीं, मिलन की आशा के हैं।
यह प्रसंग हनुमान जी की लंका वापसी कथा का भावनात्मक शिखर है। यहाँ भक्ति बोलती है, शब्द मौन हो जाते हैं। श्रीराम का आशीर्वाद—“तुमने जो किया, वह त्रिलोकी में अनुपम है”—हनुमान जी के दास्य-भाव को और प्रखर करता है।
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रणनीति का सूत्रपात — युद्ध से पूर्व धर्म-नीति
हनुमान जी लंका की स्थिति, रावण की शक्ति, दुर्गों और रक्षा-व्यवस्था का शास्त्रोक्त विवरण देते हैं। यह सूचना युद्ध-रणनीति का आधार बनती है। यहाँ कथा बताती है कि भक्ति और बुद्धि साथ-साथ चलें, तभी विजय सुनिश्चित होती है।
अयोध्या का अंतःसंबंध — भविष्य का संकेत
यद्यपि इस चरण में श्रीराम वनवास में हैं, पर शास्त्र संकेत देते हैं कि अयोध्या का स्मरण आशा का दीप है। हनुमान जी की वापसी, माता सीता का संदेश—सब मिलकर उस भविष्य का संकेत देते हैं, जहाँ धर्मराज्य की पुनर्स्थापना होगी।
हनुमान जी की लंका वापसी कथा यहाँ केवल वर्तमान नहीं, भविष्य का वचन बन जाती है।
भक्ति-दर्शन — क्यों अमर है यह प्रसंग?
कर्तव्यनिष्ठा: हनुमान जी का प्रत्येक कर्म प्रभु-आज्ञा से प्रेरित।
विनम्र पराक्रम: शक्ति होते हुए भी अहंकार शून्य।
संदेश-वाहक की महिमा: एक शुभ संदेश युद्ध की दिशा बदल देता है।
धर्म-रणनीति: सत्य और नीति की विजय।
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समकालीन अर्थ — आज के पाठक के लिए संदेश
आज के जीवन में भी हनुमान जी की लंका वापसी कथा हमें सिखाती है
संकट के बाद संयम रखें।
सफलता को सेवा में बदलें।
सही सूचना, सही समय पर दें।
नेतृत्व का आधार विनम्रता हो।
निष्कर्ष
यह एपिसोड 15 रामायण का वह प्रकाशस्तंभ है, जहाँ अंधकार के बीच आशा प्रज्वलित होती है। हनुमान जी की लंका वापसी कथा भक्ति, नीति और पराक्रम का अद्भुत संगम है—जो युगों-युगों तक प्रेरणा देता रहेगा।
