महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां सामाजिक असमानता पर रिपोर्ट लगातार गहराती जा रही है। बड़ी आबादी अंधेरी रातों में संघर्ष करती है, जबकि उजालों पर मुट्ठीभर प्रभावशाली लोगों का अधिकार कायम है। मेहनतकश वर्ग की पीड़ा, परिश्रम और प्रतीक्षा का फल अक्सर उन हाथों में चला जाता है, जिनका जमीनी संघर्ष से कोई सीधा संबंध नहीं होता।
गरीब, किसान, मजदूर, श्रमिक और निम्न-मध्यम वर्ग की रातें समस्याओं से घिरी होती हैं। कोई रोटी की तलाश में रात काटता है, कोई मौसम और फसल की चिंता में जागता है, तो कोई रोजगार के अनिश्चित भविष्य में सपनों को दबाकर सोता है। लेकिन हर सुबह उनके सामने वही अधूरी उम्मीदें और पुराने संघर्ष खड़े मिलते हैं।
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इसके विपरीत, विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग पहले से तय उजालों में जीवन व्यतीत करता है। सत्ता, संसाधन और सिफारिश उनके लिए सुरक्षा कवच बन जाते हैं। गरीबों के नाम पर योजनाएं बनती हैं, लेकिन लाभ अक्सर उसी वर्ग को मिलता है जिसकी पहुंच व्यवस्था के शक्तिशाली गलियारों तक आसानी से होती है। यह परिस्थिति केवल आर्थिक अंतर नहीं दिखाती, बल्कि यह सामाजिक और नैतिक असमानता की भी गहरी तस्वीर पेश करती है।
जब मेहनत को उसका मूल्य नहीं मिलता और पहचान के आधार पर अवसरों का बंटवारा होता है, तब व्यवस्था पर आम जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। लोकतंत्र की जड़ें वहीं हिलती हैं, जहां न्याय और बराबरी कमजोर पड़ जाती है।
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आज जरूरत इस बात की है कि उजालों का अधिकार सबके लिए समान हो। संघर्ष को सम्मान मिले और अवसर योग्यता, आवश्यकता और पारदर्शी प्रणाली के आधार पर वितरित हों। अंधेरी रातों में संघर्ष कर रहे वर्ग के जीवन में वास्तविक रोशनी तभी आएगी, जब विकास केवल कुछ लोगों का अधिकार न होकर सबका हक बने।
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