
कल्पना पाण्डेय
प्रवासियों के कारण नौकरियाँ खोने का भय है। 2024 की चुनाव प्रचार में रिपब्लिकन पार्टी ने ऐसा दावा किया कि, डेमोक्रेटिक पार्टी प्रवासियों को चुनाव के लिए आयात कर रही है। वर्तमान अमेरिकी राजनीति रोज एक सर्कस बनती जा रही है। ट्रंप और उनकी पार्टी ने इस अभियान का समर्थन देकर अपनी असली पहचान उजागर की है। यह पार्टी अब केवल दक्षिणपंथी नीतियों की नहीं बल्कि सीधे नस्लश्रेष्ठता की प्रवक्ता बन गई है। ‘अमेरिकन ईगल’ जैसी कंपनियाँ इस विचारधारा को बाजार में चमकदार कागज में लपेटकर बेचती हैं, और दक्षिणपंथी राजनेता इसे वैचारिक वैधता देते हैं।
यूजेनिक्स की सूक्ष्म छाया अभी भी टिकी हुई है। मीडिया और विज्ञापनों में ‘सुंदर, शुद्ध, आकर्षक’ गुणों को अभी भी “अच्छे जनुक” के रूप में दिखाया जाता है। यूजेनिक्स आज नकार दी गई है, फिर भी उसके नीचे भेदभाव की जड़ें अभी भी समाज में हैं। ‘गुड जींस’ ये आज सहज बोले जाने वाले शब्द हैं लेकिन उनके पीछे यूजेनिक्स के भयंकर वारिसे का इतिहास है। ये शब्द सहज, विनोदी या फैशनेबल मानकर स्वीकार किए गए तो वह भयंकर ऐतिहासिक वारिसा मिट जाएगा। आज भी यदि हम ऐसी भाषा को सहन करेंगे, तो कल वह फिर से भेदभाव, घृणा और हिंसा की राजनीति को समर्थन करेगी। कॉर्पोरेट लाभ और दक्षिणपंथी राजनीति मिलकर जब नस्लश्रेष्ठता की पुनर्रचना करते हैं, तो इससे उभरी भावनाएं लोगों के दिमाग पर छाप छोड़ती हैं। सौंदर्य, शुद्धता और श्रेष्ठता के मापदंडों को “जींस” के रंग से जोड़ना मतलब अतीत के अपराधों को वर्तमान फैशन में पैक करके बेचना। यह केवल बाजार की गलती नहीं—यह समाज को अतीत की सबसे घातक विचारों की ओर ले जाने वाली बात है।
विज्ञान के नाम पर समाज को दी गई इस चालना ने नस्लवाद, विकलांगता-द्वेष, स्त्रीद्वेष, और सामाजिक अन्याय को ‘वैज्ञानिक’ ढंग से आधिकारिकता दी। करोड़ों लोगों की जबरदस्ती नसबंदी की गई, अल्पसंख्यकों पर अमानुषिक क्रूरता हुई, और इस विचार ने नाजी नरसंहार को भी दार्शनिक आधार दिया। आज भी राजनीति या मीडिया में ‘गुड जींस’ की बात आए, तो उसकी पृष्ठभूमि याद रखना आवश्यक है। विज्ञान का उपयोग मानवीय समानता के लिए होना चाहिए, भेदभाव या नस्लश्रेष्ठता के लिए नहीं। यूजेनिक्स का इतिहास इसी अतिभयानक खतरे की आभास कराता है। नीली जींस का यह विज्ञापन यूजेनिक्स के अवशेषों का उदाहरण है।
— कल्पना पाण्डेय