ऑनलाइन गेमिंग की लत बनी खतरनाक, पिता की गर्दन पर चाकू रखने तक पहुंचा मामला

गाजियाबाद में किशोरियों की आत्महत्या के बाद हरियाणा से सामने आई चौंकाने वाली घटना

हरियाणा (राष्ट्र की परम्परा)। यूपी के गाजियाबाद में कोरियन संस्कृति के प्रति गहरे लगाव और पारिवारिक विरोध के बीच तीन किशोरियों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटना के बाद अब हरियाणा के कैथल से ऑनलाइन गेमिंग की लत से जुड़ा एक बेहद गंभीर और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। इस घटना ने न केवल एक परिवार को झकझोर कर रख दिया, बल्कि पूरे समाज के लिए एक कड़ी चेतावनी भी बनकर उभरी है।

कैथल जिले में एक किशोर ने ऑनलाइन गेम का टास्क पूरा करने के लिए अपने ही पिता की गर्दन पर चाकू रख दिया। यह घटना आधी रात को हुई, जब पूरा परिवार सो रहा था। गनीमत यह रही कि चाकू से वार करने से पहले ही पिता की नींद खुल गई, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया। अगर समय रहते पिता जाग नहीं जाते, तो परिणाम बेहद भयावह हो सकता था।

यह मामला नागरिक अस्पताल के मॉनिटरिंग एंड इवैल्यूएशन ऑफिसर और डिपार्टमेंट ऑफ साइकेट्री से जुड़े डॉ. विनय गुप्ता ने साझा किया। उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले करनाल के बल्ला गांव से एक अभिभावक अपने बेटे को इलाज के लिए अस्पताल लेकर आए थे। जांच और काउंसलिंग के दौरान सामने आया कि बच्चा एक ऐसे ऑनलाइन गेम का आदी हो चुका था, जिसमें अगले लेवल पर पहुंचने के लिए हिंसक टास्क दिए जाते हैं।

डॉ. विनय गुप्ता के अनुसार, गेम की लत इस हद तक बढ़ चुकी थी कि बच्चे को अपने ही परिवार के सदस्य दुश्मन नजर आने लगे थे। गेम में मिले टास्क के अनुसार उसे रात के समय अपने पिता की गर्दन पर चाकू रखना था। इसी निर्देश का पालन करते हुए बच्चा आधी रात को उठा और अपने पिता के पास जाकर उनकी गर्दन पर चाकू रख दिया। हालांकि उसने हमला नहीं किया और पिता के जाग जाने से स्थिति संभल गई।

काउंसलिंग के दौरान यह भी सामने आया कि बच्चे के माता-पिता के बीच घरेलू हिंसा होती थी। इस तनावपूर्ण माहौल का बच्चे की मानसिक स्थिति पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ा। ऑनलाइन गेमिंग और पारिवारिक कलह के संयुक्त असर ने बच्चे की सोच और व्यवहार को हिंसक दिशा में मोड़ दिया। डॉ. विनय गुप्ता ने बताया कि लगातार काउंसलिंग के बाद बच्चे के व्यवहार में कुछ हद तक सुधार जरूर देखा गया है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है।

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विशेषज्ञों के अनुसार, ऑनलाइन गेमिंग के दौरान मिलने वाले वर्चुअल रिवार्ड्स बच्चों के दिमाग में डोपामाइन नामक न्यूरोट्रांसमीटर का स्तर तेजी से बढ़ा देते हैं। डोपामाइन को ‘फील-गुड’ या आनंद हार्मोन कहा जाता है। यह प्रेरणा, खुशी, ध्यान, स्मृति और शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है। जब बार-बार गेम के जरिए डोपामाइन का स्राव होता है, तो बच्चा उसी आनंद को पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है।

जिले में ऐसे अन्य मामले भी सामने आए हैं, जहां बच्चे गेम में हथियार खरीदने या अपने करैक्टर को अपग्रेड करने के लिए घर में चोरी जैसी घटनाओं को अंजाम देने लगे। काउंसलर्स का कहना है कि गेमिंग की लत बच्चों की निर्णय क्षमता को प्रभावित करती है, जिससे उन्हें सही और गलत के बीच का फर्क समझ में नहीं आता।

डॉ. विनय गुप्ता का कहना है कि यदि समय रहते हस्तक्षेप न किया जाए, तो ऐसे बच्चे न केवल गंभीर अपराध की ओर बढ़ सकते हैं, बल्कि आत्मघाती कदम भी उठा सकते हैं। यह स्थिति माता-पिता, स्कूलों और समाज सभी के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

इस पूरे मामले में स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बड़ी कमी भी सामने आई है। नागरिक अस्पताल में करीब एक साल से कोई स्थायी मनोचिकित्सक तैनात नहीं है। फिलहाल पूरा उपचार और परामर्श काउंसलर्स के भरोसे चल रहा है। गंभीर मानसिक विकारों से पीड़ित मरीजों को दवाइयों या विशेष इलाज के लिए रोहतक पीजीआई या अन्य बड़े चिकित्सा केंद्रों में रेफर करना पड़ता है।
स्वास्थ्य विभाग की यह कमी खासतौर पर उन परिवारों पर भारी पड़ रही है, जो निजी इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय पर सरकारी स्तर पर पर्याप्त मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हों, तो ऐसे मामलों को शुरुआती स्तर पर ही संभाला जा सकता है।

ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी यह घटना यह साफ संकेत देती है कि डिजिटल दुनिया में बच्चों की गतिविधियों पर निगरानी और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर ध्यान देने की जरूरत है। समय रहते सही मार्गदर्शन और काउंसलिंग ही ऐसे खतरनाक हालात को रोक सकती है।

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Karan Pandey

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