मोबाइल की लत: संस्कारों से आत्मघात तक की खतरनाक यात्रा

लेखक – नवनीत मिश्र

आज के दौर में मोबाइल फोन ने जीवन को जितना सुविधाजनक बनाया है, उतना ही वह बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक भी साबित हो रहा है। आज मोबाइल केवल संचार का साधन नहीं रहा, बल्कि बच्चों की सोच, भावनाओं और जीवन-दृष्टि को नियंत्रित करने वाली ताकत बन चुका है। इसका दुष्परिणाम अब केवल पढ़ाई या व्यवहार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जानलेवा घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है।
गाजियाबाद की दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। नौवीं मंजिल से छलांग लगाकर तीन सगी बहनों द्वारा जीवन समाप्त कर लेना किसी भी सभ्य समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है। यह घटना इसलिए और भी भयावह है क्योंकि इन बच्चियों ने दो वर्षों से स्कूल जाना छोड़ दिया था, उनका संसार मोबाइल की स्क्रीन तक सिमट चुका था और वे वास्तविक दुनिया से कटकर आभासी सपनों में जी रही थीं। कोरिया जाने जैसी कल्पनाएं इस बात का संकेत हैं कि मोबाइल ने उनके मन-मस्तिष्क को किस हद तक जकड़ लिया था।
मोबाइल की लत बच्चों से उनका बचपन छीन रही है। परिवार के साथ संवाद, संस्कारों की सीख, खेल-कूद, मित्रता और सामाजिक अनुभव, ये सब धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। स्क्रीन पर दिखने वाली दुनिया बच्चों को आकर्षक जरूर लगती है, लेकिन वह भावनात्मक रूप से खोखली होती है। जब बच्चे उसी आभासी दुनिया को ही अपना सत्य मान लेते हैं, तब असंतोष, अवसाद और अकेलापन गहराने लगता है।

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इस पूरी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि रोकथाम की कारगर नीति आखिर कहां है। ऐसी घटनाएं सामने आने के बावजूद न तो समाज जागता दिखता है और न ही शासन-प्रशासन कोई ठोस पहल करता नजर आता है। कई देशों में बच्चों के लिए मोबाइल और सोशल मीडिया के उपयोग पर सख्त प्रतिबंध और स्पष्ट नियम बनाए गए हैं। वहां यह समझ लिया गया है कि बच्चों की स्वतंत्रता, अनुशासन के बिना विनाशकारी हो सकती है।
भारत में भी अब केवल चिंता व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है। सरकार को चाहिए कि बच्चों के मोबाइल उपयोग के लिए उम्र आधारित नियम तय करे, स्क्रीन-टाइम की स्पष्ट सीमा हो और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल अनुशासन और पारिवारिक संवाद को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। आवश्यकता पड़े तो बच्चों के लिए मोबाइल उपयोग पर लाइसेंस जैसी व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।

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साथ ही अभिभावकों की भूमिका भी सबसे अहम है। बच्चों को मोबाइल थमाकर चुप करा देना आसान है, लेकिन उन्हें समय देना, उनकी बात सुनना और उनके भीतर के तनाव को समझना जरूरी है। बच्चों के हाथ में मोबाइल की जगह कलम, किताब, खेल और रचनात्मक माहौल लौटाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
गाजियाबाद की घटना एक चेतावनी है। यदि अब भी आंखें मूंदे रखीं गईं, तो मोबाइल की यह लत न जाने कितने परिवारों को जीवनभर का जख्म दे जाएगी। यह केवल बच्चों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है कि वह इस खतरनाक यात्रा को यहीं रोक दे।

Editor CP pandey

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