निर्णय व निश्चय के मध्य हमको
कुछ तो अंतर दिखलाई देता है,
निर्णय जब कुछ कदम बढ़ाता है,
निश्चय निर्णय कर आगे बढ़ता है।
जब हमको कुछ फुर्सत मिल जाये
तो यह अवश्य देखें कि हमारे बेटा व
बेटी कहीं असामान्य तो नहीं लगते हैं,
उनके संरक्षण में हम बेफ़िक्र तो नहीं हैं।
कोचिंग में पढ़ने ही जा रहे हैं वह,
मोबाइल फ़ोन में पासवर्ड तो नहीं है,
सोसल चैट का उपयोग कर रहे हों तो
चैट डिलीट का आप्शन तो नहीं है।
घंटों अकेले कमरे में या अपने दोस्तों
संग समय वह नहीं बिताते रहते हैं,
प्रोजेक्ट है या कुछ और कह दोस्तों
के घर बार बार तो नहीं जा रहे हैं ।
अगर बच्चे का स्कूल शिकायत करे,
स्कूल की बात पर अवश्य ध्यान दें,
शिक्षक की बात सुनें, गुस्सा न करें,
बच्चों को प्यार दें, पर अनुशासित रखें।
यद्यपि बेटे बेटी में फ़र्क़ नहीं रखना,
दोनो को एक समान प्यार भी देना,
बेटे अगर हमारे वंश के सम्वाहक हैं,
तो बेटियों हमारी घर की इज़्ज़त हैं।
हिंदू संस्कृति, हमारी मर्यादा है,
सदा सनातन भी है, वैदिक भी है,
बच्चे भविष्य के इनके संरक्षक हैं,
इसमें आफ़ताब की नहीं ज़रूरत है।
आदित्य ये शिक्षा आज ज़रूरी है,
अपनी बिटिया को जरूर पढाएँ,
आजादी भी दें, पर इतनी नहीं कि,
जंगल में उसके टुकड़े पाये जायें।
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’
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