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दिमागी रेबीज यानी इंसान से दूरी कुत्ते से करीबी

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ लोग अपनी मां को वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं, लेकिन कुत्तों के लिए मखमली बिस्तर खरीदते हैं। जहाँ बच्चे की फीस चुकाना कठिन होता है, पर पालतू जानवर के लिए सालगिरह पार्टी देना ‘प्यारा’ माना जाता है। यह वह युग है जहाँ संवेदना की दिशा बदली है, विस्तार नहीं हुआ। पशु-पक्षियों से प्रेम करना बुरा नहीं, परन्तु जब यही प्रेम इंसानों से दूरी और उपेक्षा में बदल जाए, तो यह मानसिक संतुलन की नहीं, मानसिक भ्रम की निशानी है।
आजकल लोग कहते हैं कि कुत्ते सबसे वफादार होते हैं। सच है, लेकिन क्या हम वफादारी को इस हद तक महान बना दें कि माता-पिता, भाई-बहन, बूढ़े पड़ोसी और जरूरतमंद समाज सब गौण हो जाएँ? वफादारी के नाम पर मानवता की अवहेलना कहाँ तक उचित है? यह प्रश्न आज की आधुनिकता को विचलित कर देने वाला है।
इंसान से अपेक्षा होती है, सवाल होते हैं, उत्तरदायित्व की मांग होती है। वहीं कुत्ते, बिल्ली, तोते और खरगोश केवल स्नेह लेते हैं, बिना कुछ माँगे। यही वजह है कि लोग अब उन जीवों के प्रति अधिक आकर्षित हैं जिनसे कोई सामाजिक जिम्मेदारी नहीं जुड़ी होती। यह करुणा नहीं, सुविधा आधारित प्रेम है।
एक ओर लोग कुत्तों के लिए जन्मदिन का केक मंगाते हैं, उन्हें कार की अगली सीट पर बैठाते हैं, और महंगे कपड़े पहनाते हैं, वहीं दूसरी ओर किसी गरीब बच्चे के कपड़े गंदे होने पर नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं। एक पक्षी घायल मिल जाए तो तस्वीर खींच कर दया प्रकट करते हैं, लेकिन सड़क किनारे भूख से बिलखता मजदूर उन्हें ‘सिस्टम की समस्या’ लगता है। यह कौन सी करुणा है जो निरीह के लिए है लेकिन जरूरतमंद इंसान के लिए नहीं?
बाजार ने इस प्रवृत्ति को भांप लिया है। अब कुत्तों के लिए स्नानगृह, बिल्लियों के लिए केक, और खरगोशों के लिए खिलौने उपलब्ध हैं। यह करोड़ों रुपये का उद्योग बन चुका है। मीडिया भी इस ‘करुणा-प्रेम’ को बढ़ावा देता है। जो पशुओं के लिए भावुक हो, वह सभ्य है। जो इंसानों के लिए भावुक हो, वह मूर्ख कहलाता है। यह संवेदना का नया वैश्विक रूप है, जिसमें भावना नहीं, ‘कूलनेस’ बिकती है।
आज के समाज में एक नई बीमारी पनप रही है — मानसिक रेबीज। जैसे कुत्ता रेबीज होने पर पागल होकर काटने लगता है, वैसे ही यह सामाजिक रेबीज लोगों को अपने जैसे इंसानों से काटने, तिरस्कृत करने और उपेक्षित करने पर मजबूर कर रहा है। यह बीमारी प्रेम का मुखौटा पहनकर फैल रही है। यह बीमारी कहती है कि इंसानों से प्रेम करना खतरे का काम है, लेकिन जानवरों से प्रेम करना सुरक्षित और प्रतिष्ठित।
यह भी देखा गया है कि बहुत से लोग अपनी अधूरी भावनाओं को पशु-पक्षियों पर थोपते हैं। जिन्हें बचपन में स्नेह नहीं मिला, वे कुत्ते को बेटा कहने लगते हैं। जिनके रिश्ते टूट गए, वे बिल्लियों को जीवन साथी मानने लगते हैं। यह प्रेम नहीं, भावनात्मक पलायन है। यह उस सच से भागने की कोशिश है जो आईना दिखाता है। पशु आईना नहीं दिखाते, इसलिए वे अब आदर्श बनते जा रहे हैं।
इस प्रवृत्ति में सबसे बड़ी गड़बड़ी यह है कि इसमें प्राथमिकताएं विकृत हो गई हैं। अब हम पशुओं को तो गोद लेते हैं, लेकिन अनाथ बच्चों को नहीं। हम पक्षियों के लिए दाना डालते हैं, लेकिन पड़ोस की विधवा के लिए एक रोटी नहीं निकालते। हम कुत्ते के बाल कटवाने के लिए हज़ार रुपये देते हैं, लेकिन किसी गरीब की दवा के लिए दस रुपये खर्च करने में संकोच करते हैं।
यह मानसिकता समाज को असंवेदनशील बना रही है। संवेदना वह होती है जो बिना भेदभाव सबके लिए हो — इंसान और जीव-जंतु दोनों के लिए। लेकिन जब यह केवल पशुओं तक सीमित हो जाए, तो वह संवेदना नहीं, ढोंग बन जाती है।
मनुष्य समाज का निर्माण आपसी सहयोग, स्नेह और सह-अस्तित्व से करता है। अगर हम एक-दूसरे से ही नफ़रत करने लगें, तो यह सभ्यता नहीं, आत्मघात है। पशु प्रेम आवश्यक है, लेकिन मानवता को कुचलकर नहीं। अगर कोई कुत्ते से प्रेम करता है तो वह सराहनीय है, पर वह तब तक ही जब वह अपनी मां की दवा, पिता की देखभाल और पड़ोसी की मदद को न भूले।
इस विषय का सबसे विडंबनापूर्ण पक्ष यह है कि यह प्रवृत्ति शिक्षा, समझ और सम्पन्नता के साथ बढ़ रही है। गरीब आदमी आज भी अपनी रोटी आधी करके मेहमान को खिलाता है, लेकिन अमीर वर्ग अब इंसान को नहीं, पशु को अपनाने में गर्व महसूस करता है।
इसका समाधान केवल एक है — संतुलन। हमें पशु-पक्षियों से प्रेम करना चाहिए, लेकिन इंसानों से दूरी बनाकर नहीं। करुणा एक वृत्ति है, उसे किसी वर्ग विशेष तक सीमित नहीं किया जा सकता। जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि हर जीव, हर प्राणी और हर इंसान अपने स्तर पर हमारे प्रेम और सहायता का हकदार है, उसी दिन यह मानसिक रेबीज समाप्त होगा।
एक समाज तभी स्वस्थ होता है जब वहाँ पंछियों के लिए दाना, कुत्तों के लिए Biscuit और साथ ही बूढ़े इंसान के लिए सहारा भी होता है। जब पक्षी घर में चहचहाते हों और वृद्ध जन आँगन में मुस्कराते हों। जब बिल्लियाँ गोदी में हों और बच्चे स्कूल में।
प्रेम का असली रूप वही है जो हर जीवन को महत्व दे। अगर आपकी करुणा केवल दुम हिलाने वालों के लिए है, और आँखों में आँसू लिए किसी भूखे बच्चे के लिए नहीं, तो यह प्रेम नहीं, दिखावा है।
कुत्ते वफादार हैं, लेकिन माँ-बाप के बराबर नहीं। पक्षियों को पालना अच्छा है, लेकिन बच्चों को पढ़ाना आवश्यक है। हर प्राणी के लिए जगह होनी चाहिए — पर इंसान को निकालकर नहीं।
अगर हम यह संतुलन नहीं बना पाए, तो यह सामाजिक महामारी बन जाएगी। और तब सचमुच हमें डरना चाहिए — किसी विषाणु से नहीं, बल्कि उस ‘दिमागी रेबीज’ से जो हमें इंसानों से काटने पर मजबूर कर देगा।

सत्यवान सौरभ

rkpnews@somnath

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